दस प्रतिनिधि कहानियाँ: हिमांशु जोशी

सजा

वह फिर आई थी आज।

कल ही तो तार मिला था। तार देखते ही क्षण-भर वह हतप्रभ-सी खड़ी रह गई थी। अपनी आँखों पर विश्वास ही न हुआ-जो कुछ लिखा गया है, क्या वह सच है ?

गुलाबी रंग का कागज मरते हुए पक्षी के डैने की तरह उसकी कॉपती अँगुलियों में थरथरा रहा था। होंठ खुले थे। आँखें पत्थर की तरह ठोस-निश्चल!

“क्या हुआ दीदी ?” श्रुति भागती हुई आई, पर भावना जैसे शून्य में कहीं खो गई थी।

धम्म-से पलंग की पाटी पर बैठ गई-निचला होंठ दाँतों के बीच दबकर नीला हो आया था।

स्थिति की भयावहता देखकर श्रुति को साहस न हुआ कि आगे बढ़कर कुछ और पूछे। वह जड़वत्‌ खड़ी रही-क्षण-भर।

भावना न जाने कब तक यों ही पाषाण-शिला-सी पलंग पर बैठी रही।

“क्या हुआ दीदी ?”

“कुछ नहीं…।”

“किसका तार है ?”

कोई उत्तर नहीं दिया भावना ने।

“मामाजी का ?”

“नहीं ।”

“फिर…?”

भावना ने इस ‘फिर’ का उत्तर देने की भी आवश्यकता नहीं समझी। वह वैसी ही लेटी रही।

देर तक कमरे में असह्य सन्नाटा रहा। अंत में चारों ओर जमी बर्फ की विशाल चट्टान को तोड़ती, किसी तरह भावना बोली, “सुरु, मेरी अटैची में कपड़े रख दे। आज ही शाम की गाड़ी से चली जाऊँगी।…।”

“कहाँ दीदी—?”

“अरे, अभी बतलाया नहीं-दिल्ली जा रही हूँ।…हमारी हैड मिस्ट्रेस को इन्फॉर्म कर देना ।”

भावना की दृष्टि अब बार-बार घड़ी के डायल की ओर जा रही थी। सवा नौ बजे गाड़ी जाएगी, इस समय आठ पच्चीस हैं।

“रात को अकेली न रहना सुरु ! जमाना बुरा है। सुक्को मौसी को जरूर बुला लेना।”

“…|”

“खाना खा लेना। मुझे भूख नहीं…।”

“…|”

“तू अपने एग्जाम की तैयारी क्‍यों नहीं करती ? फाइनल ईयर है। अरी, खड़ी-खड़ी मुँह क्या देख रही है ?” इस बार तनिक तुनककर भावना ने कहा तो श्रुति सहम-सी गई। डरती-डरती बोली, “बिना खाना खाए ही चली जाओगी दीदी !”

“हाँ—कह तो दिया !”

“कुछ बाँध दूँ?”

“नहीं !!!”

यों ही हड़बड़ी में भावना चली गई तो सब अजीब-अजीब-सा लगा-एक विचित्र-सी पहेली।

दीदी ने यह भी नहीं बतलाया कि तार किसका था ? क्‍या लिखा था?

सुक्को मौसी बड़े कमरे में खराटे भरती हुई सो गईं, पर श्रुति भावना के कमरे में बैठी देर तक पढ़ती रही।

तभी पन्ने पलटते-पलटते पता नहीं किस तरह पेन जमीन पर गिर पड़ा । उसे उठाने के लिए श्रुति झुकी ही थी कि नीचे, वही गुलाबी रंग का कागज, मुड़ा-तुड़ा पड़ा था।

बड़ी सावधानी से फटे कागज की सलवटें ठीक करके पढ़ने का प्रयास किया। लिखा था-‘रतन एक्सपायर्ड ! नीचे दस्तखतों की जगह किन्हीं ‘विनोद’ नामक सज्जन का नाम अंकित था !

—तो जीजाजी चल बसे !

श्रुति बुदबुदाई।

फिर लाख कोशिश करने के बाद भी पढ़ने में मन नहीं लगा। दीदी की आंतरिक व्यथा साकार होकर आँखों के आगे घूमती रही।

सारी रात पड़ी-पड़ी सोचती रही-जीवन-भर दीदी को क्‍या मिला ? जीजाजी द्वारा प्रताड़ित, अपमानित होकर, घर से निकाली जाने के पश्चात्, उन्होंने कितना कुछ नहीं सहा !

उसे याद आया-वह बालकनी में बैठी, जाड़ों की पीली, पथराई धूप में गीले बाल सुखा रही थी, तभी किसी ने बतलाया, “सुनो बिटिया, रतन ने दूसरी शादी कर लई है।”

दीदी ने सुने का अनसुना कर दिया, जैसे पहले से सब जानती हों । उन्हें तनिक भी अचरज न हुआ…।

दीदी चाहतीं तो क्या-क्या नहीं कर सकती थीं ! कानून साथ था। बड़े मौसाजी जाने-माने वकील। किंतु न जाने क्या सोचकर वह होंठ सिए चुप बैठी रहीं।

—प्रारब्ध में इत्ता ही सुख था तो अधिक कहाँ से आता ! दीदी उड़ी-उड़ी-सी कभी दुहरा दिया करती थीं।

बड़े चाचाजी, मामाजी, बुआजी-सबने कहा-दूसरी शादी करने के लिए, पर यहाँ भी भावना दीदी पहेली बनी चुपचाप बैठी रहीं।

कितना सहा दीदी ने ! कितना ! कितना-श्रुति बिछौने में मुँह छिपाकर सिसकने लगी।

“कौन, भावना बहू ! कब आई ?” ससुराल के रिश्ते की किन्हीं वृद्धा ने आँगन में पाँव धरते ही पूछा।

“अभी माँजी…!”

“तार दिया था-बिन्नू ने ?”

‘‘जी-हाँ!’’

अटैची थामे भावना क्षण-भर वैसी ही खड़ी रही-दरवाजे के पल्लू के सहारे…। फिर चुपचाप भीतर चली गई।

घर में कुहराम मचा था, परंतु भावना गूँगी, बहरी-सी चुप बैठी रही। न रोई, न चिल्लाई। मूक दर्शक की तरह यंत्रवत्‌ सब देखती रही—

वह औरत रो रही थी-जिसे अब रतन की पली कहते हैं, रतन जिसे ब्याहकर लाया था, जिसकी सूनी माँग में अब सूखे घाव की दरार-सी पड़ गई है।

भावना देखती रही–

दुबला-पतला शरीर !

पीली देह !

इसी के प्यार में पागल होकर रतन ने उसे कितनी यंत्रणाएँ दी थीं ! क्या-क्या नहीं कहा था ! क्या-क्या नहीं किया था ! जब सब असह्य हो गया तो एक दिन घर से भी निकाल बाहर किया था। पापा नहीं रहे, तो फिर किसी का भी भय न रहा…!

दो बच्चे बाहर खड़े थे। एक नन्हा-सा, किसी की गोदी में खरगोश की तरह दुबका बैठा था। अपनी माँ को रोते देखता तो स्वयं भी मुँह फाड़कर रोने लगता …।

यह वही घर था, जहाँ भावना एक दिन दुल्हन बनकर आई थी। पापा कहते थे-अपनी भावना को हमने चंदा और करुणा से भी अच्छा घर दिया है। खूब सुख से रहेगी…राज रचेगी…

कैसा राज रचाया ! कितने सुख से बिताए चार साल !-भावना का हृदय यह सोचने मात्र से सिहर उठा।

ढेर सारे गंदे कपड़े, जिन्हें यहाँ बिस्तर की संज्ञा दी जा रही है, एक ओर पड़े हैं। पलंग टूटा हुआ है। मेज के एक पाँव के नीचे ईंट का आधा टुकड़ा पड़ा है।

“रतन की बीमारी ने हमें कहीं का भी नहीं रख छोड़ा । बर्तन-भाँड़े तक बिक गए ।” वृद्धा सास माँ कपाल पर हाथ रखे, अपने फूटे करम को रो रही थीं। किसी से कह रही थीं, “अंत में भाई तक मुँह बिरा गए मौसी ! मरते समय मेरे रत्तू के घर कफन तक के लिए पैसे नहीं थे। |”

भावना सुनती रही।

एक-दो दिन तक चुप देखती रही।

तीसरे दिन अपने घर लौटते समय जब रहा न गया तो बूढ़ी सास को एकांत में ले जाकर बोली, “ये कुछ रुपए हैं माँजी ! क्रिया-कर्म में लगा देना। बच्चों को दुःख न देना। विनोद कह रहे थे-बच्चों का स्कूल जाना छुड़वा दिया है। उन्हें फिर स्कूल भिजवा देना ।…जो कुछ बन सकेगा, मैं करूँगी… ।”

“बहू, यह तू क्या कह रही है ? तेरे साथ उसने जो कुछ किया, उसके बाद तो…”

“जो कुछ उन्होंने किया, उनके साथ ही चला गया माँजी ! पर इन अबोध बच्चों का क्या दोष ?”

साथ लाई दो-तीन साड़ियाँ भावना छोड़ गई। बच्चों के लिए कुछ रुपए भी। रिक्शे पर बैठती-बैठती बोली, “माँजी, कभी उधर चली आना। मन बहल जाएगा। हमें भी खुशी होगी। माँ तो बचपन में ही हमें छोड़कर चल बसी थीं। जब से होश सँभाला आपको ही माँ की ठौर पर पाया।”

“बहू, अब तू इत्ता दुःख न दे ! हमारे किए की इत्ती बड़ी सजा नहीं !” बूढ़ी सास का अब तक थमा बाँध टूट बहा, “उसके ऐसे धन्‍न भाग कहाँ थे !…अपने किए पापों की सारी सजा भुगत गया पगला…!”

रिक्शे पर टूटी टहनी की तरह निढाल पड़ी भावना बैठी रही । माँग का सिंदूर न जाने कब, कैसे पुँछ गया था। उसका अब कोई निशान न था, पर हाँ, नौ साल लंबी थकान उसके मुरझाए मुखड़े पर आज अवश्य उभर आई थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *