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सरयू से गंगासरयू से गंगा

कमलाकांत त्रिपाठी के उपन्यास ‘सरयू से गंगा’ का अंश

…प्लासी की परिणति में कंपनी के पिट्ठू मीर जाफर को बंगाल की गद्दी मिलने के बाद तो इन किसानों-बुनकरों की फरियाद सुननेवाला भी कोई नहीं रहा। कंपनी के कारकुनों का मन इतना बढ़ गया कि वे कर-वसूली और कानून-व्यवस्था के काम में लगे नाज़िमों और फौज़दारों से भी दो-दो हाथ करने को तैयार रहने लगे। कंपनी के ढाका, कासिमबाजार और अजीमाबाद (पटना) के ‘कारखानों’ में हथियारबंद सिपाहियों की कुमुकें रहती थीं जो उसके गुमाश्तों के साथ चलती थीं। एक बार तो पटना के एजेंट एलिस ने अपनी 500 सिपाहियों की कुमुक नवाब के मुँगेर किले की ही तलाशी लेने भेज दी-महज़ इस संदेह पर कि वहाँ कंपनी के दो भगोड़े छिपे हुए हैं। नवाब की अदालतों को तो वे मानते ही नहीं थे। वे तो अपने को बरतानिया कानून और बरतानिया अदालत के अधीन कहते थे, रहें चाहे जहाँ…हाय रे बुल-1493 का पापल बुल!

बक्सर में हिंदुस्तानी पक्ष की हार इसलिए नहीं होती कि अंग्रेजी सेना का नेतृत्व करनेवाले कोई बेहतर या असाधारण रूप से बहादुर इंसान हैं। उनका कंपनी से और कंपनी का इंग्लैंड की संसद से वही नाता है जो आपसी लाभ के लिए गोलबंद हुए खुदगर्ज मुनाफाख़ोरों का होता है। सिर्फ आयात-निर्यात के लिए कंपनी को मिली छूट का उसके कारकुनों द्वारा देश के भीतर निजी व्यापार के लिए इस्तेमाल कंपनी के हित पर भी कुठाराघात है। नौकर का मन निजी फायदे में लग गया तो मालिक के काम पर उसका ध्यान क्‍या रहेगा! और देशी व्यापारियों को दस्तक बेचकर जो लाभ मिलता है उसे भी तो कर्मचारी ही हड़प रहे हैं। कर्मचारियों के निजी व्यापार और मूलतः उनके निजी हितों के लिए लड़े गए युद्धों से कंपनी का जो माली नुकसान हो रहा है उसके चलते वह सन्‌ 1772 तक दिवालिया होने के कगार पर पहुँच जाएगी।

जैसा कि भ्रष्ट कर्मचारी अक्सर करते हैं, इस निजी व्यापार को वे अपने अल्पवेतन की बिना पर न्यायोचित ठहराते हैं। अल्पवेतन की भरपाई कितने से होगी? एक बार मर्यादा टूटी तो विचलन कहाँ जाकर रुकेगा, कोई अंत है? ‘अल्पवेतन’ वाली कंपनी कौ यह नौकरी इतनी आकर्षक है कि बरतानिया के तमाम शिक्षित-अर्धशिक्षित नौजवान इसके पीछे भागते, हिंदुस्तान चले आ रहे हैं। निरापद और सर्वस्वीकृत व्यक्तिगत लूट से रातोरात मालामाल होने का ऐसा अवसर और कहाँ मिलेगा?

कंपनी के हिस्सेदार भी कंपनी को चूना लगानेवाली इन हरकतों से अलग कहाँ हैं? हिंदुस्तान से लूट-खसोटकर ले जाया गया धन ही तो उनके शेयरों में लगा है। प्लासी के षड्यंत्रकारी अभियान से कंपनी को देय मुआवजे के अलावा रिश्वत के दो लाख चौंतीस हज़ार पौंड लेकर क्लाइव सन्‌ 1760 में इंग्लैंड पहुँचा तो वहाँ उसने कंपनी के इतने सारे शेयर ख़रीद लिए कि उस पर नियंत्रण पाने की होड़ में शामिल हो गया। इस नव-अर्जित धन से उसने हाउस ऑफ लॉर्ड की सदस्यता हासिल की और उसके प्रभाव से बंगाल का गवर्नर और मुख्य सेनापति नियुक्त होकर चार साल बाद दुबारा हिंदुस्तान चल पड़ा…और जब संसद में उस पर अभियोग चलेगा (1773) तो वह कहेगा-महोदय! मुझे तो अपने संयम पर आश्चर्य है, कि मैंने इतना ही क्‍यों लिया, मेरे सामने तो नवाब का पूरा खजाना खुला पड़ा था और मुझसे कहा गया था, जितना चाहिए, ले लीजिए…फिर, मैंने ऐसा कुछ नहीं किया जो कंपनी की परिपाटी के ख़िलाफ़ हो…और संसद उसके द्वारा मुकुट को दी गई सेवाओं का ध्यान रखते हुए उसे बरी कर देगी…अगर वह अगले साल खुदकुशी कर लेगा तो इसमें संसद का क्‍या दोष? क्लाइव…फिर मुलाकात होगी क्लाइव से। दुबारा हिंदुस्तान आ रहा है…अभी समुद्र में है।

जब कंपनी के खुदगर्ज कर्मचारियों को अपने निजी लाभ के लिए कंपनी के ही नफे-नुकसान का ख़्याल नहीं तो देशी व्यापारियों, किसानों और बुनकरों की मिट्टी पलीद करने में वे कोई कसर क्यों उठा रखेंगे? देशी व्यापारी या तो चुंगी और महसूल की भारी रकमें अदा करें, नहीं तो अंग्रेज कारकुनों से दस्तक खरीदें। ऐसे में कंपनी और उसके बदगुमान कर्मचारियों के सामने वे बाज़ार में कहाँ टिक सकते हैं? उन्हें तो देर-सवेर जाना ही है।

उधर कंपनी के गुमाश्तों की मनमानी से आजिज आए बुनकर और दस्तकार भी काम छोड़कर गाँवों की ओर पलायन कर रहे हैं। वहाँ ऊँचे लगान पर छोटी-छोटी काश्त का जुगाड़कर अलाभकारी खेती करने, नहीं तो खेत-मजदूर बनकर खटने के अलावा उनके सामने और कोई चारा नहीं। और वे अपने पुश्तैनी पेशे के चलते दोनों कामों के लिए एकदम नौसिखिया और शारिरिक रूप से अक्षम हैं।

इस तरह उत्पादन और व्यापार दोनों में अभूतपूर्व गिरावट से नवाबी खजाने को तो सूखना ही है।

कंपनी के कर्मचारियों और गुमाश्तों की धाँधली से खाली हुए ख़जाने के कारण मीर जाफर कंपनी को देय मुआवजा चुकाने में असमर्थ रहता है। क्लाइव के बाद गवर्नर बना वेंसिटार्ट उसे नवाब की गद्दी से उतारकर उसके दामाद मीर कासिम को गद्दी देने की पेशकश करता है। गुप्त वार्ता में कासिम वादा करता है कि कंपनी का बकाया चुकाने के अलावा वह बंगाल के तीन सबसे उपजाऊ ज़िले वर्दवान, मिदनापुर और चटगाँव कंपनी के हवाले कर देगा और कलकत्ता-कौंसिल को दो लाख पौंड की रिश्वत अलग से देगा। जब वेंसिटार्ट सेना के साथ मीर जाफुर को हटाने मुर्शिदावाद की ओर बढ़ता है, जाफर बिना किसी खून-ख़राबे के गद्दी छोड़ देता है। तो इस बार सत्ता-परिवर्तन होता है एक ‘रक्तहीन क्रांति’ से और मीर कासिम बन जाता है नया नवाब (1760)।

और मैं, इतिहास, झाँक रहा हूँ कासिम की बीवी के दिल में, जो जाफर की बेटी है। औरतें तो सत्ता की बिसात में छोटे प्यादे-जैसी रही हैं, जिन्हें बिसूरता छोड़ वजीर और घोड़े और हाथी और ऊँट मैदान में आगे बढ़ जाते हैं।

मीर कासिम अतिशय महत्त्वाकांक्षी तो है ही, कर्मठ भी है। वह बेहद सख्ती से लगान और महसूलों की उगाही करके रिश्वत देने का वादा तो पूरा करता ही है, कंपनी को जाफर का बकाया भी अदा कर देता है। वादे के अनुसार तीनों जिले कंपनी के हवाले करने में तो कोई दिक्कत ही नहीं। ऐसे में महत्त्वाकांक्षी कासिम का यह सोचना लाज़िमी है कि इतना करने के बाद अब वह कंपनी का जुआ उतारकर पूरी तरह आज़ाद हो सकता है।

कलकत्ते के अंग्रेजों की रोज़-रोज् की किचकिच से नजात पाने के लिए वह अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुँगेर उठा ले जाता है। सेना की तादाद बढ़ाने और यूरोपी साहसिकों की मदद से उसे ठीक से प्रशिक्षित करने की योजना बनाता है। लेकिन इसके लिए जब ख़जाने का जायज़ा लिया जाता है तो वह तो करीब-करीब ख़ाली है। बहुत सोच-विचार करने पर उसे एक ही रास्ता नज़र आता है-अंग्रेजों के निजी व्यापार पर कर की गैरकानूनी छूट का ख़ात्मा, क्योंकि उसका ज़िक्र न किसी फरमान में है, न किसी इकरारनामे में।

लेकिन यहाँ कासिम भूल जाता है कि विष की बेल पर अमृत नहीं फला करता। मीर जाफर ने अपने स्वामी सिराजुद्दौला से ऐतिहासिक गद्दी की थी। कासिम ने अपने श्वसुर मीर जाफर से वैसी ही गद्दारी की है। अब वह चाहता है, अंग्रेज, जिनकी शह पर उसने गद्दारी की और जिनके बल पर वह नवाब बना, ठीक इकरारों और फरमानों के अनुसार चलें। उसे भान नहीं है कि निरंकुश फौजी ताकत, मौकापरस्ती, विश्वासघात और मक्‍कारी के उस दौर में न्याय और नीति की गुहार लगाना कितना बेमानी है! उस दौर में क्या, किसी भी दौर में!…लेकिन हुआ है, मेरे सामने कई बार हुआ है, दूसरों के साथ दगा करनेवाले भी अपने लिए न्याय की गुहार लगाते हैं।

कासिम बार-बार आपत्ति उठाता है तो गवर्नर वेंसिटार्ट उससे बात करने मुँगेर आता है। देशी व्यापारियों से महसूल की कई दरें हैं जो 40 प्रतिशत तक जाती हैं। नवाब मान जाता है कि अंग्रेज अपने निजी व्यापार पर बस रियायती 9 प्रतिशत महसूल दे दें। लेकिन कंपनी के कर्मचारियों को नवाबी अदालतों और फौजदारों के अधिकार से मुक्त रखने के सवाल पर वह एकदम से अड़ जाता है। वह जानता है, ऐसा होने पर तो अंग्रेजों से कुछ भी वसूल नहीं होगा। आख़िर दोनों के बीच इकरारनामे का जो मसौदा बनता है, उसमें वेंसिटार्ट को नवाबी अदालतों और हाकिमों का अधिकार मानना पड़ता है।…

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कब तक?

स्त्री-विमर्श पर अनेक चर्चाएं, बहस, नारे व आलेख जोर पकड़ रहे हैं पर उनकी मदद में परिवार, समाज की भागीदारी बहुत कम है। अपने ही परिवार का झूठा गर्व, ब्राह्मणत्व का अहं याद आते ही कामिनी का रोष से चेहरा सुर्ख हो जाता है। स्नेह का स्निग्ध गोरा चेहरा बहुत सारे प्रश्न ले सामने आ जाता है। मिश्रा परिवार की सबसे छोटी बेटी स्नेह ने परिवार के सारे अभावों से सामंजस्य बैठा लिया था क्योंकि पिता की मृत्यु के पश्चात् अपढ़ मां को खेत-खलिहान, मिट्टी-गारे व ईंट के जहां से जूझते देखा है। अर्थाभाव से बड़ी बहन शांता कानपुर के परंपरावादी परिवार में टीबी से मर गई, दूसरी बहन रेखा बूढ़े से ब्याह दी गई पर बूढ़ा भी उसे तिल-तिल जला रहा है। उससे छोटी यूपी के एक कस्बे में शराबी ऐयाशी पति को कमाकर खिलाते हुए हाड़-मांस का पिंजरा हो गई। दो ब्राह्मण पुत्र परिवार की चिंता से मुक्त हैं। छोटा कांस्टेबल है। दिन-रात गाली बकता मां को राशन भर ला देता है। स्नेह को प्यार से सब रानी कहते। उसकी मां को पूरा विश्वास था कि वह किसी योग्य वर से ब्याही जाएगी। इसी विश्वास पर वो मंदबुद्धि स्नेह को झिड़कतीµ‘घर के काम के बावजूद सुबह उठकर पढ़ना मत भूलना।’ उस दिन भी रानी अपनी तितर-बितर जिंदगी को संवारने हेतु थकी-मांदी होने पर भी पढ़ने बैठी पर भाई ने सख्त आवाज में पुकाराµरानी परांठे व चाय बना, मुझे परेड में जल्दी जाना है। नींद से ऊंघती स्नेह चौके में धंसी, चूल्हे में कंडे पर घासलेट डाल उसने जैसे ही माचिस जलाई तो नीचे गिरे घासलेट में आग फैली और दर्द से रानी जलती हुई चीखने लगीµबचाओ। सब दौड़े तब लज्जावश रानी ने कपड़े अपनी जांघ के बीच कर लिए। भाई के हाथ जले, मां के कुछ बाल, पर रानी बहुत जल गई।
सांसों की सीमाएं तो नहीं टूटीं और लापरवाह इलाज के बावजूद वो बच गई। हां, उसका चेहरा वैसा ही निष्पाप भोला रहा। पल भर में शेष मीठापन कसैला हो गया क्योंकि जलकर जंघा का मांस पेट से जुड़ा और रानी ठीक से चल भी नहीं पाती। तब भी झुकी हुई लड़की पूरे समय मां को छांह देती। घरेलू कार्यों से मुंह न मोड़कर आठवीं तक सफल रही। उसकी इस दुर्गति को देख हम सबने उसे बीटी करने का सुझाव दिया। हिम्मत व साहस से शरीर से झुकी उस लड़की ने कम नंबरों से ही बीटी कर ही लिया। जिला शिक्षा अधिकारी ने उसे प्राइमरी पाठशाला पंधाना में नौकरी दे दी। रानी इतनी खुश थी कि अपने इस छोटे से जाफरी वाले मकान में जैसे वो हवा महल में रह रही हो। क्योंकि वो मां को भी साथ ले गई। शायद जीवन के कुछ वर्ष यहां के रहने में भी सुखकर थे। लेकिन रानी की मां सुमन का ब्राह्मणत्व ऐंठा और बिना किसी की सलाह के एक दिन पता चला कि मां-बेटे ने रानी का ब्याह गांव के पांडे जी से कर दिया जिनकी एक परचून की गुमटी थी।
जली-कटी ब्याही सी स्त्री को पांडे जी ने यूं ही तो नहीं ब्याहा। सुमन से उन्होंने किराने का दो माह का सामान, पलंग, गद्दे, बर्तन एवं गहने ले ही लिए। बेटी की कमाई से जमा-पूंजी इसी तरह काम आ गई। बेजोड़ हिम्मत से नौकरी करती रानी पूरे माह का वेतन सहर्ष पति के हाथों में पतिव्रता बन सौंप देती। छह माह संतोषजनक थे और जो नहीं होना था वह हो गया था। ऐसी शारीरिक विकृति बीच वह गर्भवती हुई और टेढ़ी-मेढ़ी स्थिति में उसने एक कन्या को जन्म दे दिया।
रानी जब कामिनी से मिली तो कामिनी ने दुःख-दर्दों पर तड़पती फुफेरी बहना को कलेजे से लगाया। रानी, इस बच्चे के बाद मैं तेरा ऑपरेशन करवा पेट व जांघ अलग करवा दूंगी। थोड़ी हिम्मत और रखना। ये पांडे जी तुझे अच्छे से रखते हैं न?
हां, वो शरमाई। व दो-तीन दिनों बाद वापस पंधाना लौटी।
लौटते ही वो सामने खड़े तूफान से अस्त-व्यस्त हो गई। अचानक घर देर से पहुंचने पर दरवाजा एक भीलनी ने खोला। सुमन ने पूछा, तुम कौन हो, यहां क्या कर रही हो?
मैं पंडित जी की पत्नी हूं।
बस बहस, दोष, गुणोें का बखान प्रारंभ हो गया। पांडे जी ने ढीठता से कहा, आपकी लड़की को कोई भी कष्ट नहीं देता पर ऐसी लूली-लंगड़ी स्त्री मेरी भरपाई नहीं कर पाती, मैं प्रेमा से प्रेम करता हूं। वो मेरी पत्नी को त्रस नहीं देगी बल्कि घर के कामों में मदद ही करेगी।
तो शादी क्यों की?
गुस्सा मत हो। आप समझती हैं न ब्राह्मण समाज में बच्चे तो जाति वाली के ही चाहिए न।
लड़की बड़ी हुई ही थी कि रानी दूसरे बच्चे की मां बन रही थी। उसे इस भार के साथ झुककर चलते देख कामिनी क्रोध से पूछ बैठीµक्यों इतनी जल्दी मरना चाहती है। तेरा पहला बच्चा कितनी परेशानी से हुआ था न?
इन्हें बेटा चाहिए न।
तू मर गई तो क्या उसे भटकने के लिए छोड़ जाएगी। और कामिनी ने तय कर उसका पूरे नौ माह बाद बच्चा होते ही दोनों ऑपरेशन करवा दिए।
पांडे जी ने सुना तो गालियां देने लगेµससुरी, तूने तो दूसरी भी धेंध पैदा कर दी, अब बेटा कैसे पैदा होगा?
मेरी हालत देख रहे हो जी, मैं क्या तीसरा पैदा कर सकती हूं?
जबान चलाती है? साली औरत को देवी कहते हैं क्योंकि वो पति की आज्ञा मानती है पर तू? और थप्पड़ पर थप्पड़ जो शुरू हुए तो वे बढ़ते ही गए। यूं तो रानी का तबादला हरसूद हो गया और वो वहां मां के साथ सुखी थी। पोलियोग्रस्त छोटी बच्ची भी पल ही रही थी, परंतु पांडे जी वहां भी पहली को पहुंच रानी से रुपए छीनने से बाज नहीं आते। कुछ समय बीता कि एक शाम पांडे जी ने अपनी औकात अनुसार सुमन से छुटकारा पाने के लिए उसके ही सामने पत्नी से जबरदस्ती की। पेटी खोली और रुपए निकाले व बड़ी बेटी को ले लौटने लगे। सुमन हताश हो उनके पैर पर गिर पड़ी। छोड़ दो इस लंगड़ी अपाहिज लड़की को। पेट भरने को तो छोड़ दिया करो।
तुम्हें इससे क्या? शर्म नहीं आती बेटी की कमाई खाते? मैं तो इसका पति हूं।
तो पति धर्म ही निभा दो। बस युद्ध तो युद्ध।
और सुमन ने कामिनी की ही गोद में दम तोड़ दिया।
कामिनी कुछ समय को रानी को अपने साथ ही ले आई और उसने महिला आयोग, जागृति मंच से रानी को मिलवा आवेदन-पत्र लगवा दिए, लेकिन वे आवेदन पत्रें के ढेर पर मोम सी खड़ी बस आश्वासन ही बांटती रही। हारकर कामिनी ने रानी से कहा, तुम तुरंत पगारे वकील साहब के पास चलो और तलाक की अरजी लगा दो।
जीजी भाई सुनेगा तो डांटेगा। मेरा भाग्य ही खोटा है।
भाग्य को मत कोसो। ऐसे डर-भय व दहशत में जीकर क्या करोगी। तुम्हें छोड़ छुट्टी तो मिले। अकेली ही सुखी रहोगी। भाई क्या तुम्हें बचाने आता है?
कहां जीजी। पिछली बार बेहोश हो पड़ी थी। बिट्टी रोती थी। मेरा चपरासी बाबूलाल आया तो उसने मुझे पलंग पर डाला व बच्ची को संभाला। अब तो उसे कुछ रुपए दे देती हूं। वो खाना भी बना देता है। बूढ़ा अकेला है, दो रोटी में खुश हो जाता है।
बढ़िया है, मैं भी उसे मदद करती रहूंगी। कामिनी ने बहन को संभाला।
लो, बाबूलाल तो लेने भी आ गया। रानी खुश थी। अभी ऑटो में सामान रखा ही जा रहा था कि रानी का भाई बबलू मोटरसाइकिल से आया व उसे डपटता चीखाµबेशर्म तलाक लेगी और इस चपरासी से मस्ती मारेगी? देखता हूं कैसे तलाक लेती है।
कुछ माह पश्चात् बाबूलाल का ही फोन आया, जीजी, रानी मैडम चल बसीं। परसों पांडे जी अपनी बेटी के साथ आए व उसके साथ मिलकर रानी मैडम के कपड़े-बर्तन सब उठा उसे पीटकर अधमरा बना चले गए।
तत्परता से कामिनी जीप से तो रानी की लाश सड़ने से पहले उठवा भाई के घर ले गई। पांडे जी वहां अवतरित हो दहाड़ मार रो रहे थे। हाय रानी तुम हमें अकेला कर छोड़ गई। रानी को महिलाओं ने नहा-धुला सजाकर कहाµकितनी भाग्यशाली थी कि सौभाग्यवती ही मरी। कितना अच्छा पति मिला।
तेरहवीं पर ही कामिनी ने बबलू व पांडे को मुस्कराते रानी के प्रॉविडेंड फंड एवं पेंशन का हिसाब जमाते सुना। कामिनी की आंखें डबडबा आईं। रानी का सुंदर चेहरा कई प्रश्नों के साथ बार-बार स्मरण आ रहा था। वह कई बार पूछती रही, जीजी क्या स्त्री को खट-खट कर मरना ही उसका देवित्व होता है। कामिनी सोच रही थी कि कब तक ससुराल से स्त्री की अरथी ही निकलगी?

कथा की अफवाहकथा की अफवाह

पंच परमेश्वर के जूते

पंच परमेश्वर के जूते उतार देखा, एक पैर का पिछला तला ज्यादा घिसा मिला, तो दूसरे पैर का आगे वाला हिस्सा। पंच परमेश्वर के जूते फट रहे थे। उन्हें लगा, जूतों के साथ न्याय नहीं हो रहा है। उन्होंने पाया कि सारी गड़बड़ी न्याय के रास्ते पर चलने के ढंग में है।
फिर अपनी परछाईं के पास बैठ गए। उन्हें लगा यह तो मेरी ही किसी बेचैनी की कहानी है।
पंच परमेश्वर तय नहीं कर पा रहे थे कि कौन सा जूता जुम्मन का है और कौन सा अलगू चौधरी का। क्या जूतों के सोल से समझी जा सकती है यह बात!
दोनों के जूतों की आहटें लगभग एक जैसी हैं।
जूते पंच परमेश्वर पर हँसे, ‘‘जूते आस्था के नियम-कायदे से थोड़े ही बने हैं। रास्तों की जरूरत में गाँठे गए हैं। जूतों ने बताया कि हम तो बस चलना और फासले तय भर करना जानते हैं। वैसे भी हमें किसी ने कब प्रार्थना या दुआ में साथ रखा। बेहतर होता आप अपना रास्ता ईमानदारी से तय करना सीखते, बजाय कि जूतों में जुम्मन शेख या अलगू चौधरी ढूँढ़ने के।’’
पंच परमेश्वर को बड़ा दुःख लगा। उनके पैर तो काट दिए जा चुके थे। बैसाखी की आवाज गूँज रही थी, कभी वे बाईं तरफ के पत्थर हटाते, कभी दाईं तरफ के।
मैं घिसी एड़ी और घिसे पंजे में से झाँकते जुम्मन शेख और अलगू चौधरी के साथ-साथ चलते, रास्ता निहार रहा था।

अत्र कुशलं तत्रास्तुअत्र कुशलं तत्रास्तु

atrakushalamtatrasatu

रामविलास शर्मा तथा अमृतलाल नागर के पत्र

बंबई
11.3.45

प्रिय विलास,
रमेश से भेंट हुई। निरालाजी के स्वास्थ्य के सम्बन्ध में मैंने उन्हें आंखों देखी, कानों सुनी बता दी। उन्हें डॉक्टर को दिखाने का प्रबन्ध तुमने डॉ. सिंह से मिलकर किया होगा। या फिलहाल तुम इसकी जरूरत ही नहीं समझते! जैसा हो खुलासा लिखना। आप लोगों की अपील का यह असर हुआ कि यहां के कई गुजराती पत्रों ने हिन्दी के लेखकों की हीन दशा बतलाते हुए निरालाजी के लिए भीख की अपील प्रकाशित की है। मैंने उन पत्रों को मंगवाया है और उन्हें पढ़ने के बाद मैं यदि जरूरत समझुंगा तो इस भीख के विरोध में गुजराती पत्रों में अपना वक्तव्य दुंगा। चंदा संसद के लिए इकट्ठा किया जा सकता है। किसी भी लेखक के नाम पर भीख नहीं मांगी जा सकती, यह उसके स्वाभिमान को चोट पहुंचाना है।
जन प्रकाशन से एक द्वैमासिक पत्र निकालने की स्कीम आज नरेन्द्र, रमेश और संगल के साथ बनी है। संपादन मण्डल में 1. रामविलास शर्मा 2. यशपाल 3. शिवदानसिंह चौहान 4. प्रकाशचंद्र गुप्त और 5. पहाड़ी का नाम देने का निश्चय किया है। यहां काम करने वाले संपादक हैं नरेन्द्र, रमेश और मैं।
90 पृष्ठ की डिमाई साइज मेगजीन। दाम 1)। (सवा रुपया) 10 पृष्ठ विज्ञापन के अलग। नाम नया साहित्य। स्तम्भ निम्नलिखित रहेंगेः-
1. रचनात्मक साहित्य (अ) कहानी (आ) एकांकी (इ) कविता (ई) स्कॅच और (उ) उपन्यासों के अंश।
2. प्राचीन साहित्य का मूल्यांकन
3. सैद्धान्तिक विचार विनिमय
4. समकालीन प्रगतियां
5. साहित्यकार
6. पुस्तक परिचय
7. अंर्तप्रांतीय और विदेशी साहित्य
8. सांस्कृतिक जागरण की समस्या
अपनी राय देना।
उपन्यास छापने की बात भी आज रमेश से हुई। जनप्रकाशन से ही छपाने का प्रबन्ध होगा। उपन्यास अब मैं देता चलुंगा।
निरालाजी ने कब तक आगरे में रहने का निश्चय किया है? जल्द प्रयास भागने की तैयारी में तो नहीं हैं? आजकल उनका कार्यक्रम क्या रहता है? कुछ लिखते पढ़ते हैं?….हिन्दुस्तान के जंगलों में अब कितने शेर और जिंदा बच रहे हैं?
तुम आजकल कितना काम कर पाते हो?
बच्चों को प्यार और असीम।
नरोत्तम के लिए किशोर के यहां काम ठीक किया है। 250 रु. मासिक वेतन से श्रीगणेश होगा। कल ही मैंने उसे पत्र लिख दिया था।
तु.
अमृत

आवश्यक
मेरे उपन्यास के लिए नाम सुझाओ।

मुक्ति-द्वार के सामने (कविता-संग्रह): प्रताप सहगलमुक्ति-द्वार के सामने (कविता-संग्रह): प्रताप सहगल

muktidwar ke samne

बाज़ार से हम बच नहीं सकते

बाज़ार से हम बच नहीं सकते
और जो राहें निकालीं
पूर्वजों ने
राहें जो मंगल भरी हैं
उन अलक्षित रास्तों से
हट नहीं सकते
बाज़ार से भी बच नहीं सकते।

डाल पर बैठे
कला का टोप पहने
झूलती है डाल
इस छोर से उस छोर तक
साधना है संतुलन
क्या है ज़रूरी?
साधना या संतुलन
गंतव्य तो हर राह का
कोई इधर, कोई उधर है
कौन सा गंतव्य किसका
किस पेड़ की छाया है किसकी
कौन सा पानी किधर को रुख करेगा
धूप का वह कौन सा टुकड़ा
किसी को क्यों मिलेगा
कुछ भी न निश्चित
समुद्र के अंदर है हलचल
बाहर सिर्फ उठते पिरामिड
प्रश्न करते
और मिटते
समंदर की गहरी हलचलों से
कट नहीं सकते
और हम बाज़ार से भी बच नहीं सकते।

अर्थहीन नहीं है सब

जब ज़मीन है
और पाँव भी
तो ज़ाहिर है
हम खड़े भी हैं।

जब सूरज है
और आँखें भी
तो ज़ाहिर है
प्रकाश भी है।

जब फूल है
और नाक भी
तो ज़ाहिर है
खुशबू भी है

जब वीणा है
और कान भी
तो ज़ाहिर है
संगीत भी है

जब तुम हो
और मैं भी
तो ज़ाहिर है
प्रेम भी है।

जब घर है और
पड़ोस भी
तो ज़ाहीर है
समाज भी है

जब यह भी है
और वो भी
यानी नल भी
जल भी और
और वो भी
यानी नल भी
जब भी और घड़ा
भी
तो ज़ाहिर है
घड़े में जल है
अर्थ की तरह
आदमी है समाज में
हर प्रश्न के
हल की तरह।

संसार के प्रसिद्ध व्यक्तियों के प्रेम-पत्रसंसार के प्रसिद्ध व्यक्तियों के प्रेम-पत्र

श्री अरविंद का पत्र मृणालिनी के नाम

(श्री अरविंद: बंगाल-विभाजन के समय का सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी, जो बाद में राजनीति से ‘संन्यास’ लेकर धर्म की शरण में चला गया…)

प्रिये,
याद रखो, तुम्हारा विवाह एक अजीब व असाधारण आदमी से हुआ है। उसे पागल भी कहा जा सकता है। लेकिन जब एक ‘पागल’ आदमी अपने मनचाहे लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है, तो दुनिया उसे महान् कहकर पुकारती है। मैंने अभी तक अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं किया है। अभी तक मैंने संजीदगी से अपने को नियमपूर्वक काम में लगाया भी नहीं है, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब मैं वैसा करूँगा। क्या तब तुम एक सच्ची ‘सहधर्मिनी’ और अपने पति की ‘शक्ति’ बनकर मेरी बगल में खड़ी होओगे?
तीन शक्तिशाली धारणाएँ, जिन्हें दुनियसा पागलपन के विचार कहेगी, मेरे हृदय में जड़ जमाती जा रही हैं। पहली यह कि जो कुछ भी मेरे पास है, वह असल में भगवान् की धरोहर है और अपनी कमाई में से बहुत थोड़ा खर्च करने का ही मैं हकदार हूँ। बाकी धर्म-कार्यों में लगना चाहिए…अभी तक मैंने रुपए में दो आने ही भगवान् को लौटाए हैं…इतना अधूरा हिसाब मैंने उसको दिया है! तुम्हें या बहन सरोजिनी को रुपया देना बहुत आसान है, लेकिन मेरा कर्तव्य तीस करोड़ भारतीयों को भाई-बहन समझना है। इसी शर्त पर भगवान् ने मुझे रुपया दिया था। मेरा कर्तव्य है कि देश के लोगों के कष्ट दूर करने के लिए सब कुछ करूँ।
दूसरे, मैं भगवान् के दर्शन करना चाहता हूँ! रास्ता कितना भी लंबा क्यों न हो और यात्रा कितनी भी कठिन क्यों न हो, मैं उन्हें आमने-सामने देखूँगा। और भगवान् है-और वह है-तो उससे साक्षात्कार करने का तथा उसे अनुभव करने का कोई न कोई रास्ता जरूर होगा। हिंदू शास्त्रों का कहना है कि भगवान् को देखा जा सकता है। वे इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कुछ विधियाँ निश्चित करते हैं। अपने सीमित व्यक्तिगत अनुभव से मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि हिंदू शास्त्रों की बात में सच्चाई है। तुम अगर मेरे साथ न भी चल सको, पर मेरे पीछे-पीछे तो ईश्वर-प्राप्ति की यात्रा पर चल सकोगी न?
तीसरे, मैं इस देश को सिर्फ एक भौगोलिक इकाई नहीं मानता। एक इकाई जिस पर पहाड़ियों के धब्बे हैं, चदियों की लकीरें और मैदानों के फैलाव हैं, बल्कि इसे माँ मानता हूँ। माँ के इस भौतिक शरीर के पीछे एक आत्मिक सच्चाई है। एक राक्षस माँ के जीवन-रक्त को चूस रहा है। मैं जानता हूँ, उसे राक्षस के चंगुल से बचाने की ताकत मुझमें है, और वह मैं करूँगा; लेकिन क्षत्रिय तेज के द्वारा नहीं, बल्कि अपने ब्रह्म तेज के द्वारा इस महाव्रत को मैं पूरा करके दिखलाऊँगा। यह एक सनक मात्र नहीं है। मेरी हड्डियों में ईश्वरा ने यह सब भरकर मुझे भेजा है। इसका बीज चौदह वर्ष की आयु में ही फूटना आरंभ हो गया था। अट्ठारह वर्ष की आयु तक यह जड़ें जमा चुका था। क्या तुम मेरी अपनी पत्नी मेरे साथ खड़ी होओगी और मुझे उत्साह व शक्ति दोगी? यद्यपि देखने में तुम एक कमजोर औरत लगती हो, पर तुम भी पूर्ण आत्मसमर्पण की भावना से ईश्वर में विश्वास रखकर काफी साहस दिखा सकती हो और बहुत कुछ प्राप्त कर सकती हो। हम दोनों इकट्ठे मिलकर ईश्वर की इच्छा पूरी कर सकते हैं…
                                                                                                                                                                                                                                                                             —अरविंद

शायर दाग़ का पत्र मुन्नी बाई के नाम

(दाग: उर्दू का वह महान् शायर, जो फौजी वातारण में जन्मा और बड़ा हुआ, मगर जिसने तलवार चलाने की बजाय फूलों के गीत बुनने ज्यादा पसंद किए…)

बाई जी, सलाम शौक!
गजब तो यह है कि दूर बैठी हो। पास होतीं तो सैर होती। कभी तुम्हारे चारों और घूमता और शोला बन जाता और कभी तुम्हें शमा करार देता और पतंगा बनकर कुरबान हो जाता। कभी तुम्हारी बलाएँ लेता और कभी सदके कुरबान हो जाता। एक खत भेजा है। जवाब की इंतजार की मुद्दत खत्म नहीं हुई कि दूसरा लिखने लगा। खुदा के लिए जल्दी आओ या आने की तारीख तय करके खबर दो। दिन-रात इंतजार में गुजरते हैं। वहाँ के लोग क्योंकर इजाजत देंगे? तुम्हीं चाहोगी तो छुट्टी ले सकोगी…मैं तुम्हारे लिए बिलबिला रहा हूँ…ये भयानक काली रातें, यह अकेलापन! क्या कहँू, क्योंकर तड़प-तड़पकर सुबह की सूरत देखता हूँ? यकीन मानना, ऐसे तड़पता हूँ, जैसे बुलबुल पिंजरे में। मेरे दोनों खतों का जवाब आना जरूरी है…

                                                                                                                                                                                                                                                            तुम्हारा दिलदादा, मुन्तजर
                                                                                                                                                                                                                                                                                    —दाग़

कागज की नाव (व्यास सम्मान से पुरस्कृत कृति)कागज की नाव (व्यास सम्मान से पुरस्कृत कृति)

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…महलका अभी सोकर उठी थी कि उसने देखा मम्मी और पापा उसके घर के आंगन में खड़े हैं। वह ताज्जुब से आगे बढ़ी। सलाम कर उन्हें अपने कमरे की तरफ ले जाने लगी तो अमजद ने कहा, “पहले जहूर साहब से मिल लूं फिर आता हूं।”

महलका के चेहरे का रंग यह सुनकर उड़्‌ गया मगर वह बड़ी खुशदिली से बोली, “क्यों नहीं पापा।”

गोलू आगे-आगे चलता हुआ उन्हें जहूर मियां के कमरे की तरफ ले गया। कमरे में घुसते ही बदबू का एक भभका दोनों की नाक में घुसा। जहूर चुपचाप बैठे थे। पास में रखी चाय की जूठी प्याली पर मक्खियां भिनभिना रही थीं। कमरे में धूल और गंदगी थी। बिस्तर की सफेद चादर पर कई तरह के धब्बे थे।

जहूर मियां ने धुंधली आंखों से देखा और पूछा, “कौन?”

“मैं अमजद, महलका का पापा…” अमजद ने बड़े संकोच भरे स्वर में कहा। यह सुनकर जहूर मियां सटपटा से गए। हड़बड़ाकर जो खड़े हुए तो लड्खड़ाकर गिरते-गिरते बचे।

“बैठे रहिए…बैठे रहिए।” अमजद ने उन्हें सहारा दिया। महजबीं का चेहरा फक् था। बदन का खून जैसे जम गया था। आवाज गले में ऐसी फंसी कि वह आगे बढ़कर सलाम तक न कर सकीं।

“आप अगर पसंद करें तो कुछ देर के लिए बाहर दालान में चलकर बैठते हैं।” अमजद ने जहूर मियां से आग्रह भरे लहजे में कहा।

“अम्मां मना करेली।” गोलू झट से बोल उठा। जहूर मियां का सिर इतना झुका कि सीने से जा लगा।

“आइए, मैं आपको लेकर चलता हूं…” अमजद ने उन्हें सहारा दिया फिर महजबीं से बोले, “तब तक तुम इस कमरे की सफाई करवा चादर, तकिया, गिलाफ बदलवा दो।”

गोलू डरकर तेजी से कमरे से निकला और तीर की तरह अपनी मालकिन के पास जाकर बोला, “हमने मना किया था मगर वह दादा मियां को यहां ला रहे हैं।”

“यहां?” महलका की तेवरी पर बल पड़ गए।

“गोलू झाड़ू लाना।” महजबीं की आवाज सुन महलका चौंक पड़ी। वह पापा के साथ ससुर को देख ठिठकी। ससुर के कपड़े गंदे थे। लुंगी में बड़ा सा खोंचा लगा था। उसे तेज गुस्सा आया मगर किस पर, पापा पर या ससुर पर?

“पापा, आपने फोन कर दिया होता?” वह धीमे से बोली।

“फोन कर देता बेटी, तो यह सब देखने को मिलता?” उनका जवाब सुनकर वह अंदर से भन्‍नाई, मां की आवाज की तरफ बढ़ी और ससुर की कोठरी में घुसते ही मां पर बरस पड़ी।

“यह क्या मम्मी? बताना तो था या फिर…” उसका जुमला पूरा नहीं हो पाया और वह फटी आंखों से मां को देखने लगी जो ससुर के कमरे की चीजें सलीके से लगा रही थी।

“यह…यह क्‍या कर रही हैं आप?”

“वही, जो तुम्हें करना चाहिए था।”

“आप कहना क्या चाह रही हैं?”

“यही कि इस कमरे की सफाई कब से नहीं हुई?”

“मुझे क्‍या पता? झाड़ू मैंने दे रखी थी। मगर उन्हें तो सारे दिन बैठकर माजी में सैर करने की आदत है।”

“अपना कमरा तुम ख़ुद साफ करती हो?”

“मैं क्‍यों करूं, गोलू जो है। यह घर मेरा है, जैसे चाहूं रखूं। आपको… ”

“सही है।”

“अच्छा, अब आप यहां से चलिए। बदबू से नाक फटी जा रही है…चलकर बताइए जो आपने भेजा है उसका इस्तेमाल कैसे करना है।”

“पहले धुली चादर और तकिया-गिलाफ लेकर आओ।”

“ठीक है।” लगभग पैर पटखती सी महलका जाने को मुड़ी तभी दरवाजे की घंटी बजी। महलका चादर लाने की जगह दरवाजे की तरफ बढी, जहां राशिद खड़ा उसका इंतजार कर रहा था।

“तुम तैयार नहीं हुईं अभी तक?” खुले दरवाजे से आवाज उभरी।

“वह…मम्मी-पापा आए हैं। तुम जाओ, कल आना।” थोड़ा घबराए लहजे से महलका बोली।

“कौन आया है?” महजबीं ने गोलू से पूछा।

“उहै, जे अम्मां के रोज घुमाए ले जालेन।” गोलू ने कूड़ा उठाते हुए कहा।

“चादर मांगकर लाओ।” महजबीं ने कहा।

“अभी हम न जायब, काहे के उ डांट दीहें हमराके…उहां अभी खड़े बाल वाला मरदे आइल बा।” गोलू इतना कहकर चुप हो गया।

“लीजिए चादर।” महलका ने लगभग चादर फेंकते हुए कहा।

“यह तो फटी है जगह-जगह से?” महजबीं ने चादर खोली तो देखा।

“उनके लिए ठीक है।” उकताए लहजे में उसने कंधा उचकाकर कहा।

“जाओ, कोई मुनासिब सी चादर लाओ।” महजबीं का लहजा इस बार सख्त था जिसे सुनकर अचकचाकर बेटी ने मां को घूरा।

 

उधर अमजद और जहूर किसी बात पर कहकहे लगा रहे थे। महलका ने ताज्जुब से पापा को देखा, तब तक मैले कपड़े का गट्ठर उठा गोलू महजबीं के पीछे-पीछे आया।

महजबीं ने साबुन से मल-मलकर हाथ धोए। मुंह पर छींटे मारे। फिर बेटी से कहा, “अब अच्छी सी चाय पिलाना, सिर दुख रहा हैं।!

“अभी लाती हूं।” कुछ शर्मिंदा सी होकर महलका बोली।

“आप नहाएंगे?” अमजद ने पूछा और उनके खोंचा लगे तहमत और मलगिजे कुर्ते को देखा।

“जी…नहाना तो चाहता हूं मगर… ”

“कपड़ा फीचल नईखे।” गोलू फुसफुसाया।

“क्यों?”

“पिछले कअ दिन से बुढ़क बीमार रहलन, ए के खातिर कपड़ा न फीच पइलन।” गोलू ने सफाई दी। सुनकर अमजद ने ठंडी सांस ली और सोचा कि यह उस बाप का हाल है जिसका लड़का हर माह हजारों रुपया मेरी बेटी को भेजता है।

चाय तीनों ने पी ली तो महलका ने मां को कुछ याद दिलाया। महजबीं ने उसे अमल किए सामान लाने को कहा। जब वह ले आई तो वहीं आंगन में खड़े-खड़े उन्होंने बोतल का पानी और पुडिया का पाउडर जमीन पर पेड की जड में गिरा दिया।

“अब अमल की चीजों की नहीं आमाल ठीक करने का वक्त है।”

“यह क्या मम्मी?” महलका हैरत भरी आवाज से चीखी।

“बस, बहुत हो चुका। मैं तो होश में आ गई हूं, अब तुम भी सुधर जाओ।”

“मतलब? ”

“अभी ससुर के नहाने का इंतजाम करो फिर बाद में फुरसत से समझाऊंगी।” इतना कहकर महजबीं ने गुस्से भरी आंखों से बेटी को घूरा। उनके दिल में अफसोस था। शदीद अफसोस! उन्हें शिकायतें थीं ससुराल वालों से मगर ऐसी हरकतें उन्होंने कभी नहीं की थीं। बेटी ने बदतमीजी की हदें पार कर दी हैं।

“यह सब मेरी गलती है।” उन्होंने ठंडी सांस भरकर आसमान की तरफ देखा, “अल्लाह! तू मुझे माफ करना। इसकी सजा मेरी बच्ची को मत देना।”

मम्मी-पापा के जाने के बाद महलका पूरी तरह बौखला सी गई थी। सिर में भी शदीद दर्द हो रहा था। इस बीच तीनों बच्चे पिट चुके थे। अब बिस्तर पर औंधे पड़े सुबक रहे थे।

“का पता आज का होकी?” गोलू ने बुजुर्ग की तरह गर्दन हिलाकर जैसे अपने से कहा हो फिर दाल धोकर गैस पर रखी। प्रेशर कूकर सूं-सूं करने लगा था।

उसका दिमाग भी सनसना रहा था।

उधर कमरे में लेटी महलका मियां को मिस कॉल पर मिस कॉल मार रही थी मगर वहां से कोई जवाब नहीं मिल रहा था। तंग आकर एस. एम. एस. करके वह आंखें बंद करके लेट गई। जाने कब उसकी आंख लग गई।

उधर जहूर परेशान थे यह सोच-सोचकर कि महलका के मां-बाप को मेरी सुध क्योंकर आई? कहीं इसमें उनकी कोई चाल तो नहीं है? महलका बीबी जैसी ताना मारने वाली, नाक पर मक्खी न बैठने देने वाली आज मेरे कमरे की सफाई कर गई, या इलाही यह माजरा क्या है?

‘यह ख़्वाब है या हकीकत? बहुत दिनों बाद नहाए थे। बदन पर साफ़ कमीज और धोती थी। धुली चादर बिछी थी। मोंगरे की खुशबू वाली अगरबत्ती धीरे-धीरे अपनी महक पूरे कमरे में फैला रही थी। उनके पपोटे भारी हो रहे थे। उनकी आंखें मुंदने लगीं और वह गहरी नींद में डूब गए।

दिमाग ने ख़्वाब बुनना शुरू कर दिया।

उनका सामान कमरे से बाहर फेंक दिया गया है। उनकी कनपटी पर महजबीं बेगम ने पिस्तौल तान रखी है और अमजद कह रहे है, “बडे मियां, जल्दी से कागजात पर दस्तख़्त करो वरना…”

‘वह घबराहट में इनकार करते हैं तो दो हट्टे-कट्टे मर्द आगे बढ़ते हैं। इससे पहले कि उनके हाथ उनकी गर्दन पर पहुंचते, उन्होंने कागज पर दस्तख्त कर दिए।

तभी कहीं से जाकिर आता है और माथा पीटकर कहता है, ‘अब्बा! आपने यह क्या कर डाला? मकान उसके नाम लिख दिया और वह तो मकान बेच राशिद के साथ भाग गई है। अब यह तीन बिना मां के बच्चों को मैं कैसे पालूंगा? अरे अब्बा! आपने यह क्‍या कर डाला है?” जाकिर सीना पीट दहाड़ें मार रो पड़ा। “आपने यह क्‍या कर डाला अब्बा, कुछ तो सोचा होता?”

हिंदी व्यंग्य की धाार्मिक पुस्तक: हरिशंकर परसाईहिंदी व्यंग्य की धाार्मिक पुस्तक: हरिशंकर परसाई

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इंस्पेक्टर मातादीन चहुंओर समाया : नरेन्द्र कोहली

परसाई जी की रचनाएं मैंने ‘धर्मयुग’ में अपने उस वय में पढ़नी आरंभ की थी, जब न तो साहित्य की उतनी समझ थी और न ही जीवन का अनुभव। मैं स्वभाव से पाठक था, इसलिए पढ़ता था। जिस रचना में रस मिलता था, उसे पढ़ जाता था। पढ़ते-पढ़ते लगा कि यह लेखक जो कुछ लिख रहा है, वह मैं भी लिखना चाहता हूं, क्योंकि वह समाज का सत्य है। समाज को मैं बहुत ज्यादा नहीं जानता था, फिर भी लगता था कि यह लेखक कृत्रिम सुहानेपन को हटाकर कुरूप यथार्थ को प्रस्तुत कर रहा है। यह मेरे स्वभाव के अनुकूल है। यह भी समझ में आ रहा था कि लोगों को झूठ पसंद नहीं है, किंतु न तो वे सच बोलते हैं और न सच बोलने की अनुमति देते हैं।
क्रमशः जीवन का अनुभव बढ़ा।
मैं तब कॉलेज में पढ़ा रहा था जब हमारे सहयोगी मल्होत्रा के साथ एक घटना घटी। वे अपने एक मित्र के साथ मोटरसाइकिल पर जा रहे थे। मोटरसाइकिल वे स्वयं ही चला रहे थे। सहसा कुछ ऐसा हो गया कि मोटरसाइकिल सड़क-मध्य की पटरी से जा टकराई। वे गिरे और अचेत हो गए। होश में आए तो अस्पताल के बिस्तर पर थे। पुलिस वाले उनका बयान लेने के लिए मुस्तैद ही नहीं खड़े थे, छटपटा भी रहे थे। मल्होत्रा ने सीधे शब्दों में बता दिया कि क्या हुआ था। पुलिस वाले ने कहा, ‘आप डरें नहीं। हमने उन दोनों को बांध रखा है, जिन्होंने आपको मारकर बेहोश कर दिया था।’
वे चकित रह गए, ‘किंतु मैं तो स्वयं मोटरसाइकिल चला रहा था।’
‘कोई बात नहीं। आप उन्हेें देख लें। और डरें नहीं। कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।’ उनके सामने हथकड़ी में बंधा उनका मित्र और एक अपरिचित व्यक्ति खड़ा था। मित्र ने रोते हुए बताया, ‘तू बेहोश हो गया था यार। तुझे अस्पताल ले जाने के लिए न कोई टैक्सी वाला तैयार हुआ, न स्कूटर वाला। आता-जाता तो कोई रुका ही नहीं। अंत में इस भले आदमी ने अपना स्कूटर रोका और तुझ लहूलुहान को इसकी सहायता से उठाकर मैं यहां लाया। मुझे तो तेरे पास रुकना ही था, पर पुलिस वालों ने तेरे घर फोन तक करने के लिए मुझे बाहर नहीं जाने दिया। कहते हैं, मैं भाग जाऊंगा। और इस भले आदमी को भी तब से अब तक बांधकर रखा है।’
‘मेरी तो सारी दिहाड़ी ही तबाह हो गई साहब!’
तब मैंने इंस्पेक्टर मातादीन का चेहरा पहली बार देखा था।
उसके बाद एक बार हमारे कॉलेज के लड़कों में छुरेबाजी हो गई थी। बीच-बचाव के चक्कर में मेरे कपड़ों पर भी खून लग गया था। गवाही मुझे देनी ही थी। ‘मेडिको लीगल’ केस था। मुझे पुलिस वालों का भी भय था और उन चाकूबाज लड़कों का भी, जिन्होंने यह कांड किया था। मैं तीन दिनों तक कांपता रहा कि जाने कब पुलिस वाले आ जाएंगे किंतु कोई नहीं आया।
बाद में उन लड़कों में से ही एक ने बताया, ‘कोई नहीं आएगा सर!’
‘क्यों?’
‘वारदात से पहले ही थाने में पैसे पहुंचा दिए थे।’
तब मैंने इंस्पेक्टर मातादीन का चेहरा दूसरी बार देखा।
समाचार-पत्र में पढ़ा कि मेरठ के पास डाकुओं ने एक बस रोकी और यात्रियों को लूट लिया। उन्होंने लूट के पैसे गिने। सात हजार कुछ रुपए थे। उन्होंने वे पैसे यात्रियों को लौटा दिए। किसी ने दुस्साहस कर पूछ ही लिया, ‘भले आदमी लूटकर कभी कोई पैसे लौटाता भी है?’
डाकुओं के सरदार ने उत्तर दिया, ‘एक बस लूटने के थाने में दस हजार देते हैं। सात हजार में बस कैसे लूट लें?’
तब मैंने तीसरी बार इंस्पेक्टर मातादीन का चेहरा देखा था। और अब तो प्रतिदिन वही देखते रहते हैं। प्रतिदिन समाचार-पत्र पढ़कर परसाई जी के ये वाक्य स्मरण हो आते हैं-
‘कोई आदमी किसी मरते हुए आदमी के पास नहीं जाता, इस डर से कि वह कत्ल के मामले में फंसा दिया जाएगा। —बेटा बीमार पिता की सेवा नहीं करता। वह डरता है कि बाप मर गया तो कहीं उस पर हत्या का आरोप न लगा दिया जाए। —घर जलते रहते हैं और कोई उसे बुझाने नहीं जाता-डरता है कि कहीं उस पर आग लगाने का जुर्म कायम न कर दिया जाए। —बच्चे नदी में डूबते रहते हैं और कोई उन्हें नहीं बचाता। इस डर से कि कहीं उस पर बच्चों को डुबोने का आरोप न लग जाए। —सारे मानवीय संबंध समाप्त हो रहे हैं। मातादीन जी ने हमारी आधी संस्कृति नष्ट कर दी है। अगर वे यहां रहे तो पूरी संस्कृति नष्ट कर देंगे। उन्हें फौरन रामराज में बुला लिया जाए।’
आजकल हमारे यहां भी हत्याएं होती हैं और कोई हत्यारा नहीं होता। बलात्कार होते हैं और बलात्कारी नहीं होता, केवल पीड़ित युवती अथवा बच्ची का शव होता है। आतंकी घटनाएं होती हैं और किसी को फांसी नहीं होती। काला बाजार, उत्कोच और भ्रष्टाचार की घटनाएं होती हैं। सरकार तो क्या प्रधानमंत्री तक को उसका पता होता है, किंतु वे कहते हैं कि वे इतने भले आदमी हैं कि कोई उनकी बात नहीं मानता। शहीदों को देशद्रोही और देशद्रोहियों को देश का नायक बनाने का अति उन्नत कोर्स और प्रशिक्षण इंस्पेक्टर मातादीन प्राप्त कर चुके हैं।

इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार (भाग-2)इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार (भाग-2)

हिंदुत्व के रखवाले

“कल मैं अपनी बात पूरी नहीं कर पाया क्योंकि तुम कुछ थके से लग रहे थे।’

‘थका नहीं था, यह जो धर्म-वर्म का चक्कर है इसमें एक बार घुस जाओ तो निकलने का रास्ता ही नहीं मिलता है, इसलिए हम लोग इससे बचते हैं। तुम तो लगता है उसी दुनिया के लिए बने हो, वहाँ तुम्हें इतना सुकून मिलता है कि बाहर आना ही नहीं चाहते।’ 

“तुम इससे बचते नहीं हो, बच सकते ही नहीं, तुम इसे दुम की ओर से पकड़कर पीछे खींचना चाहते हो, वह पलटकर तुम्हें खा जाता है और तुम्हारा चेहरा मुस्लिम लीग के चेहरे में बदल जाता है, जिसे तुम लाल झंडे से छिपाना चाहते हो। जानते हो मैं क्‍यों सेक्युलरिज्म का झंडा और सेमेटिज्म का डंडा उठाकर चलने वालों को भग्नचेत यानी शिजोफेनिक मानता हूँ? इसलिए कि/तुम हाहाकार मचाते हो हिंदू मूल्यों को बचाने का, साथ देते हो उन मूल्यों को नष्ट करने वालों का। बात करते हो समावेशिता का, बहुलता का और साथ देते हो बहुलता और समावेशिता को नष्ट करने वालों का। बात करते हो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की और वह स्वतंत्रता तुमने कभी किसी को दी ही नहीं और आज भी स्वतंत्र विचारों को नहीं सुनते, सुनते प्रियं अनिष्टकरं को हो। तुम्हें किसी ने हाशिए पर नहीं लगाया, स्मृतिभ्रंश और तज्जन्य बुद्धिनाश के शिकार हो गए-‘स्मृति भ्रंशात्‌ बुद्धिनाश: बुद्धिनाशात्‌ प्रणश्यति।’ कई बार सोचना पड़ता है कि क्या गीता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को आगाह करने के लिए त्रिकालदर्शी प्रज्ञा से लिखी गई थी, और दुःख होता है यह सोचकर कि हमारे पितरों ने जो पाठ अपने वंशजों के लिए लिखा था उसको समझने की योग्यता तक तुम अर्जित न कर सके।’

“गजब का स्टैमिना है, बेवकूफी की बातें भी इतने आत्मविश्वास से करते हो कि अनाड़ी आदमी हो तो उसे ही सही मान ले। अरे भई, पढ़ने को बहुत कुछ है दुनिया में, चुनाव करना पड़ता है, कौन सा ज्ञान कब का है और उसे पढ़कर हम इतिहास के किस मुकाम पर ठहरे रह जाएँगे। हम नए ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक सूचनाओं से लैस होने का प्रयत्न करते हैं कि अपने समय के साथ चल सकें, तुम दो हजार, चार हजार वर्ष पीछे की चीजें पढ़ते हो और वहीं ठिठके रह जाते हो, आगे बढ़ने का नाम ही नहीं लेते। अतीत के अंधविवर में कितने सुकून से रह लेते हो, यह सोचकर दया आती है। तुम जिसे अनमोल समझकर गले लटकाए फिरंते हो वह गले में बँधा पत्थर है। डूबने वालों के काम आता है। हम तुम्हें बचाने के लिए कहते हैं, “हटाओ इसे ‘, तुम सुनते हो ‘मिटाओ इसे ‘। हल्यूसिनेशन के शिकार तो तुम हो।’

दाद दिए बिना न रहा गया, पर याद दिलाना पड़ा कि “जानना जीना नहीं है, निर्मूल होकर हवा में उड़ते फिरोगे, और इस भ्रम में भी रहोगे कि खासी ऊँचाई पर पहुँच गए हो, पर हवा के तनिक से मोड़ या ठहराव के साथ जमीन पर कूड़े की तरह बिखर जाआगे। मूलोच्छिन्न उधिया सकता है, तनकर खड़ा नहीं हो सकता।’

“जिस रास्ते पर तुम चल रहे हो, वह अमल में आ जाए तो जानते हो भारत का क्या हाल होगा। वह हिंदू पाकिस्तान बन जाएगा। भारत का नाम नक्शे पर रहेगा, पर भारत पाकिस्तान की दर्पणछाया बन जाएगा, देखने में उलटा, परंतु सर्वांग सदृश। तुम नाम से हिंदू हो, हम आत्मा से, इसलिए उन मूल्यों के लिए तुम खतरा बन रहे हो और हम उन्हें तुमसे बचाने पर लगे हुए हैं। हम हिंदुत्व का विरोध नहीं करते, हिंदू समाज के सैफ्रनाइजेशन का, भगवाकरण का विरोध करते हैं। हम हिंदुत्व की रक्षा करना चाहते हैं, तुम उसे मिटा रहे हो। समझे?’

“यह बताओ, तुम्हारी जमात में कोई ऐसा आदमी मिल सकता है जो होश-हवास में हो? ऐसा जो उन शब्दों का मतलब जानता हो जिनका वह धडल्ले से प्रयोग करता है? सैफ्रन-सैफ्रन चिल्लाते रहते हो, फिर भगवा-भगवा चिल्लाने लगते हो, इनका अर्थ जानते हो? सैफ्रन का अर्थ जानते हो?!

‘जानूँगा क्यों नहीं। सैफ्रन, जाफरान, केसर।’

यह जानते हो कि सैफ्रन अरबी जाफरान का बदला हुआ रूप है?

यह वह नहीं जानता था, फिर मैंने पूछा, ‘जाफरान अरब की जलवायु में नहीं उग सकता यह भी जानते होगे?’

वह तुरत मान गया। फिर मैंने समझाया कि “उच्चारण, श्रवण और संचार में इतने टेढ़े-मेढ़े रास्ते हैं जिन सबका पता आधुनिक भाषाविज्ञान को भी नहीं है, और यदि उस नियम का पता हो भी जिसमें केसर जाफरान बन सकता है तो मुझे अपनी सीमाओं के कारण, उसका ज्ञान नहीं, परंतु यह पता है कि शब्द वस्तु के साथ जाता है और नई स्थितियों के अनुसार ढल भी जाता है, और इसलिए यह कश्मीर के उत्पाद अथवा संस्कृत में इसके लिए प्रयुक्त शब्द केसर का प्रसार है और अरब तक सीधे जुड़े भारतीय व्यापारतंत्र के प्रताप का इस शब्द के माध्यम से एक नक्शा तक तैयार किया जा सकता है।’

“तुमसे इसके उत्तर की आशा भी नहीं थी, फिर भी जब तुम भगवाकरण कहते हो तो इसका पता होना चाहिए कि इसका अर्थ कया है, जानते हो?!

वह चक्कर खा गया। समझाना पड़ा, ‘भग-भर्ग का अर्थ है अग्नि, सूर्य, प्रकाश। इसका एक अर्थ भाग भी था, पर इसका स्रोत भिन्‍न है। इसके इतिहास में जाना न चाहेंगे क्योंकि तब बात फिर अधूरी रह जाएगी, इसलिए विश्वास करो ये सभी अर्थ थे और इनका पल्‍लवन भी हुआ, और इससे भक्त और भजन तक पैदा हो गए, परंतु यहाँ यह समझो कि भगवा का अर्थ था सूर्यवर्ण। इसके लिए जिस रंग को सबसे अनुरूप माना गया था, वह था केसर को उबालकर उससे पैदा होने वाला रंग और इस तरह केसरिया, शौर्य, गरिमा और गौरव का द्योतक बन गया। अब यह बताओ, गैरिक का अर्थ जानते हो क्या?!

वह नहीं जानता था। बताना पड़ा, ‘गैरिक का अर्थ है गेरू का वर्ण। जानते हो हरित वर्ण या हल्दी के रंग का इससे क्या संबंध है?’

वह यह भी नहीं जानता था, बताना पड़ा कि “* दसियों हजार साल पहले से एक बहुत बड़े भूभाग में कृमिनाशक के रूप में हल्दी और गेरू के रंग का प्रयोग होता आया है। हरित वर्ण या हल्दी का रंग और केसर वर्ण दोनों में निकटता है इसलिए केसरिया वास्तव में हल्दिया या हल्दी के रंग में रँगा हुआ वस्त्र हुआ।

* अब समझो, एक का संबंध शौर्य से हे और दूसरे का रोगाणु निवारण से। दोनों के अर्थभ्रम और वर्णपभ्रम से गेरू के रंग का या गैरिक (इनके साथ रामरज मिट्टी के रंग को दीवार आदि की रँँगाई आदि के संदर्भ में याद किया जा सकता है।) गेरू कृमिनाशक के रूप में प्रयोग में आता था। वस्त्र को कृमि निवारक बनाने के लिए गेरू या हल्दी में रँगा जाता था। गेरू में रँगा गैरिक या हल्दी में रँगा हरित इसके कारण एक-दूसरे के पर्याय बन गए। रोगनिवारण का विस्तार अमरता में हुआ और इनका अर्थ सूर्यवर्ण और अमरता का एक रूप हुआ सूर्यलोक या स्वर्ग में प्रवेश का अवसर। यह केसरिया बाने में प्रतिफलित हुआ। जब तुम सैफ्रनाइजेशन का उपहास करते हो तो कया जानते हो, तुम उन असंख्य बलिदानों का उपहास कर रहे हो। तुम जैसा सोचते हो उससे तो तुम भगत सिंह को भी मूर्ख कह सकते हो कि अपनी जान बचा सकता था फिर भी जान-बूझकर मृत्यु का वरण किया, और मौका मिलते ही भगत सिंह जिंदाबाद के नारे भी लगा सकते हो। अब नए सिरे से सोचो, पाओगे सैफ्रन का अर्थ है गौरव। शौर्य का वर्ण, त्याग का वर्ण, महिमा का वर्ण, सूर्यवर्ण, शूरों का वर्ण, अमरता का वर्ण, सुवर्ण या सुनहला रंग और जब तुम इसका उपहास करते हो तो इन सबका उपहास करते हो।

* जानते हो, एक समय था जब यह रंग भारत से लेकर यूरोप तक गौरव, महिमा, त्याग, बलिदान और शौर्य का रंग माना जाता था। तुम जानते हो अवेस्ता का रचनाकार कौन है? ‘

“जरदुस्त्र कहते हैं शायद।’

“जरंदुस्त्र नहीं, जरदवस्त्र या सुनहले या गैरिक या केसर वर्ण का वस्त्र पहनने वाला। तुमको पता है, रोम के लोग राजा के वस्त्र या लबादे को क्या कहते थे? स्वर्णिम वस्त्र या केसरिया वस्त्र, पर्पल रोब। यार, तुम होश में आओ, होश में सोचना-समझना और जो कुछ बकते हो उसके परिणामों को समझना शुरू कर दो तो तुमसे अच्छा कौन है? दिल जिगर लो जान लो। हम भी चाहते हैं तुम्हें तुम्हारी तूफाने-बदतमीजी और दौरे-बदहवासी से तुम्हें बाहर लाना।!

11-01-2016

इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार (भाग-1)इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार (भाग-1)

इतिहासपुरुष

‘तानाशाही के खतरे वाली जो बात तुम कर रहे थे वह तो सचमुच संभव लगती है। इस आदमी में तानाशाही प्रवृत्ति कूट-कूटकर भरी है। उसका चेहरा नहीं देखते। बोलता है तो लगता है बुलडॉग भौंक रहा है, पंजे मारता हुआ।’
मैंने कुछ खिन्न स्वर में कहा, ‘तुम्हें तुम्हारी पार्टी ने संस्कार में यही दिया? इससे आगे बढ़ने का मंत्र तक नहीं सिखाया।’
उसका चेहरा देखने लायक था।
मैं उस पर सवार हो गया, ‘देखो, तुम किसी व्यक्ति का अपमान नहीं कर रहे हो। अपने देश के प्रधानमंत्री का अपमान कर रहे हो। उस जनता का अपमान कर रहे हो जिसने उसे सिर-माथे चढ़ा लिया। और अपना भी अपमान कर रहे हो, क्योंकि तुम उसे देश के नागरिक हो जिसका प्रधानमंत्री वैसा है, जैसा तुमने बनाना और दिखाना चाहा।’
‘गलती हो गई भाई। माफ भी करो।’
‘गलती नहीं हुई है, यह तुम्हारी आदत का हिस्सा बन गया है, वरना यह बात तुम्हें कल ही समझ में आ गई होती, और इस गलती की नौबत न आती। बुरा मत मानना, साम्यवाद की लोरी सुनाते-सुनाते तुम्हें ऐसा घोल पिलाया जाता रहा कि तुम आदमी से भेड़िये में तबदील हो गए। तुम्हें अविजेय बनाने के लिए असरदार नारेबाजी और हंगामेबाजी की आदम डाली जाती रही। तुम्हारा सबसे प्रबुद्ध वर्ग तो मजदूर वर्ग है। सर्वहारा। उसकी भाषा तुम्हारे सुशिक्षित, प्रतिबद्ध वर्ग की आदर्श भाषा बन गई। वह समादृत संबंधों के स्वजनों-परिजनों के अंग-उपांग का नाम लेकर प्रजनन प्रक्रिया से जुड़े शब्दों का प्रयोग गाली के रूप में अपने कथन को प्रभावशाली बनाने के लिए करता है, तुमने गालियों का स्तर थोड़ा ऊपर कर दिया। तुमको किसी ने बताया नहीं कि यह फासिस्टों और नाजियों की भाषा है और इसी धज में तुम्हें लंबी जबान और छोटे दिमाग के साथ फासिज्म से लड़ने को खड़ा कर दिया गया, जबकि तुम्हें यह बताया तक नहीं गया कि फासिज्म है क्या बला, किन परिस्थितियों में पैदा होता है, वह अपने भीतर से ही कितना खोखला होता है। बताया सिर्फ यह गया कि अन्य गालियों की तरह फासिज्म भी एक गाली है। जिसकी जबान बंद करनी हो उसे फासिस्ट कह दो और डंका बजाओ। अब तुम्हें आत्मोद्धार के लिए, अपने भेड़िये से लंबी जंग लड़नी होगी दुबारा आदमी बनने के लिए।’
वह ‘अब फूटा-तब फूटा’ की स्थिति में था। मैं आवेश में बोल तो गया पर ग्लानि मुझे भी थी। दोष उसका तो न था। एक जमाने में मैं यह भाषा भले न बोलता था, पर मुझे यह बुरी कतई नहीं लगती थी। ‘आधा गाँव’ के कुछ चरित्रों की भाषा आज भी गलत नहीं लगती। प्रश्न औचित्य का है। कुछ देर तक हम चुप बैठे रहे। जब चुप्पी भारी पड़ने लगी तो बात उसे ही शुरू करनी पड़ी, ‘मैंने कुछ सख्त बात कह दी, उसका खेद है, लेकिन यह तो मनोगे ही कि उसमें तानाशाही प्रवृत्ति है?’
‘भले मानस, खेद हुआ और जबाने संभाली तो कम से कम ‘उनमें’ तो कहा होता। चलो माफ किया। एक दिन में हुआ भी तो कितना सुधार होगा।
‘रही बात तानाशाही प्रवृत्ति की तो यह प्रवृत्ति तो मुझमें भी है। तुम मेरे लिखने-पढ़ने के कमरे को देखो तो बस केआस नजर आएगा। चीजें बिखरी हुई हैं। जो अपनी किताबें और कागज संभाल नहीं पाता वह भी सोचता है कि अगर मौका मिले तो मैं दुनिया को इस तरह चलाऊं। तानाशाह होना सभी चाहते हैं। कम से कम वे जो अपने घर परिवार को किसी आदर्श संस्था के रूप में चलाना चाहते हैं, छोटे-मोटे तानाशाह ही बने रहते हैं। तानाशाही इतनी बुरी चीज नहीं है। हां, दुरुस्त भी नहीं है। तानाशाह तो गांधी जी भी बनना चाहते थे और सच कहो तो जब तक उनकी चली तानाशाह ही बने रहे। नेहरू ने तो अपनी तानाशाही आकांक्षाओं के बारे में एक लेख, मॉडर्न रिव्यू में चाणक्य के नाम से लिखा था। बाद में किसी ने पूछा, क्या अब भी आप में वह प्रवृत्ति है, तो कहा, ‘मैंने पहले ही इसे भांप लिया था इसलिए बच गया।’ बचे वह भी नहीं, पर कोशिश करते रहे। नेहरू में जितना अंतर्विरोध मिलेगा उतना दूसरे किसी नेता में नहीं। वह अपने से लड़ते भी थे, अपने को छिपाते भी थे और अपनी जिद पर आ जाने पर जानते हुए कि यह शायद ठीक नहीं है वही करते थे। वह तानाशाही प्रवृत्ति उनमें दबी रही, इन्दिरा जी में उभर आई, पर इस प्रवृत्ति से लड़ने की कोशिश वह भी करती थीं, केवल कभी-कभी। संजय में यह जबरदस्त थी। मूर्खता की हद तक। मेनका में भी उतनी ही प्रबल है। जो लोग निर्माण करना चाहते हैं, वे जो कुछ जिस तरह बनाना चाहते हैं, उसमें बाधा न पड़े, सभी एक लय में, तालमेल से काम करें, उस सपने को साकार करने को जो महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति को तानाशाह बनाता है। फिल्म का डायरेक्टर, टीम का कप्तान, ऑर्केस्ट्रा का संचालक, सेना का नायक सभी तानाशाह ही होते हैं। तानाशाही प्रवृत्ति का मूल यही है। और तुमको तो ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए। तुम लोग तो स्वयं तानाशाही के पक्षधर हो। !

“अरे भई, वह तानाशाही किसी व्यक्ति की नहीं होती।’

मैं हँसने लगा तो वह सकपका गया।

“पहले इस कटु सत्य को समझो कि मोदी एक विषेष ऐतिहासिक परिस्थिति की उपज है। इतिहासपुरुष है। उसे भारतीय जन समाज ने 2013 में तानाशाह के रूप में… !

*2013 में नहीं, 2014 में और तानाशाह के रूप में नहीं, भावी प्रधानमंत्री के रूप में। तानाशाह वह खुद बनना चाहता है। जब तुम इतनी मामूली बातें भी नहीं समझ पाते तो… ‘

मैंने उसे वाक्य पूरा करने ही नहीं दिया, ‘2014 में निर्वाचन हुआ और जनता पार्टी जीती। जनता ने तो 2013 में ही उपलब्ध तानाशाहों में से किसी एक को चुनना आरंभ कर दिया था-आडवानी को इतने नंबर, राहुल को इतने, सोनिया को इतने, नीतीश को इतने और मोदी को इ-त-ने। एक बार नहीं, बार-बार मोदी को इ-त-ने नंबर मिलते रहे। जब किसी एक व्यक्ति को केंद्र में रखकर पूरा चुनाव हो तो जीत या हार किसी दल की नहीं होती, तानाशाह की होती है।’

‘ जनता का विश्वास कांग्रेस के कारनामों के कारण लोकतंत्र से उठ गया था। वह तानाशाह चुन रही थी और मोदी को चुन लिया था। कर्मकांड 2014 में पूरा हुआ। कांग्रेस 2013 में मान चुकी थी कि वह हार गई और जल्दी-जल्दी जो जर-जमीन हथियाया जा सकता था उसे हथियाने पर जुट गई थी, फिर भी एक आखिरी बाजी उसने लगाई, सबको भोजन का अधिकार। समाज ने समझा, ‘सब कुछ खा जाने का अधिकार।’ उसने कांग्रेस को यह बता दिया कि देश-हित तुम्हारी प्राथमिकता नहीं। उसने उसे हराया नहीं, धक्के देकर बाहर कर दिया, यह देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है, परंतु इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

‘ अकेली ऐसी पार्टी जिसका देशव्यापी जनाधार था, जो ही विकल्प बन सकती थी, उसने अपना नैतिक औचित्य खो दिया। वह हारी नहीं। लोकतंत्र में हार-जीत होती रहती है। कांग्रेस का सफाया हो गया फिर भी प्रबल शक्ति बन कर सत्ता में आई, क्योंकि जिस विकल्प ने उसे सत्ता से बाहर किया था, वह धँस गया। कोई दूसरा विकल्प ही न था। इस बार कांग्रेस हारी नहीं है, अपनी भ्रष्टता के कारण अपना नैतिक अधिकार खोकर धँस गई है और अब नेहरू परिवार से बाहर आकर भी अपने मलबे सँभाल नहीं सकती। दुखद स्थिति है, पर है। क्या किया जा सकता है!

‘ इसमें आशा की किरण एक ही है कि लोगों ने भले तानाशाह चुना हो, इस व्यक्ति को लोकतंत्र में इतना अंडिग विश्वास है कि यह अपना विकल्प स्वयं पैदा करेगा। पर वह विकल्प या विपक्ष विकास की नीतियों से संचालित होगा, जाति और धर्म से नहीं।

‘ और जानते हो यह भी मोदी के कारण नहीं होगा, इतिहास के कारण होगा। पूँजीवादी विकास के कारण होगा। तानाशाही पूँजीवाद को रास नहीं आती। तानाशाही मध्यकालीन मनोवृत्ति है। तानाशाह स्वेच्छाचारी राजा का प्रतिरूप। मोदी को इसकी समझ हे, दूसरों को नहीं। वह बार-बार इसकी याद दिलाते हैं कि यह लोकतंत्र की महिमा है कि एक चाय बेचने वाला देश का प्रधानमंत्री बन गया। यह भारत में उभरते पूँजीवादी दबाव की भी महिमा है या नहीं?

‘ जनता ने भले तानाशाह चुना हो वह तानाशाह लोकतांत्रिक बने रहने के लिए संघर्ष कर रहा है, दुश्मनों और सगों दोनों से एक साथ लड़ता हुआ। ‘

02-11-2015