Sale!

मानवाधिकार की असीमित सरहदें / Manvadhikar ki Aseemit Sarhadein

250.00 195.00

ISBN: 978-93-83233-97-7
Edition: 2015
Pages: 136
Language: Hindi
Format: Hardback


Author : Pushpa Sinha

Compare
Category:

Description

इक्कीसवीं सदी को मानवाधिकर एवं टेक्नोलोजी की सदी माना जा रहा है। मानवाधिकर प्रकृति द्वारा दी गई जीवन की जरूरी शर्तें हैं जिसमें मानव अपना जीवन स्वेच्छा से मर्यादापूर्वक जी सके। हर धर्म एवं शास्त्रों में यह माना गया है कि प्रत्येक मानव जन्म से समान एवं स्वतंत्र है।लेकिन हमारी दुनिया की सामाजिक व्यवस्था ऐसी है जो एक मानव को दूसरे मानव से विभिन्न आधारों पर, जैसे—लिंग, धर्म, जाति, स्थानविशेष, भाषा आदि के द्वारा ऊंच या नीच समझता है।तब ऐसी स्थिति में मानव के जीवन एवं मर्यादा की रक्षा के लिए मानवाधिकार शब्द का आविष्कार किया गया। अतः सही मायने में मानवाधिकार एक सभ्य समाज के जीवन-शैली की रूपरेखा है जिसमें सभी अधिकार सभी को मिल सकें। मानव के अपने मूल-अधिकारों के हनन से ही समाज में असंतोष फैलता है, जो धीरे-धीरे उग्र होकर हिंसा का रूप लेता है, जिसके फलस्वरूप आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी भयानक सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है। अतः मानवाधिकार का मूल-मंत्र है ‘सर्वेभवन्तुसुखिनः’। समाज में अधिकार और कर्तव्य का ताना-बाना बहुत सूक्ष्म है , यानी कि प्रत्येक मानव द्वारा हर पल सही कर्म करने की गति हो तभी ‘मानवाधिकार की असीमित सरहदें’ पार की जा सकती हैं।

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “मानवाधिकार की असीमित सरहदें / Manvadhikar ki Aseemit Sarhadein”

Your email address will not be published. Required fields are marked *