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सुप्रसिद्ध लेखिका मधु कांकरिया के कहानी संग्रह  “…और अंत में ईशु” से एक कहानी ‘कुल्ला’

पहली मर्तबा जब उसने मर्द की आँखों में झाँका तो उसे चाँद-सितारे दिखाई दिए। उस रात उसने अपने मर्द से कविता की भाषा में बात की। शायरियों में जवाब दिया। और जब दूसरी दफा उसने मर्द को जाना, उसकी दो दिन बढ़ी दाढ़ी की महक ली तो उसकी उनींदी आँखें थोड़ी चौड़ी हुईं। आत्मा में हलकी-सी हलचल हुई। वह चौंकी। फिर उसके बाद क्या हुआ, मर्द और दुनिया पर उसकी राय क्या बनी यह कहानी उसी की एक छोटी-सी दास्तान है।इस अनोखी कहानी की वह अनूठी नायिका मुझे मिली थी वर्षों पूर्व राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे और बड़े-से गाँव भीलवाड़ा में ।उस अनूठी युवती का नाम था प्रमिला, जो जिंदगी के निहायत कोमल और रेशमी ताने-बाने से बनी हुई थी। मर्द और प्रेम, दोनों को ही उसने या तो किताबों से जाना था या हीर-राँझा, शीरीं-फरहाद जैसी कहानियों से या फिर सावन में उठान लेते झूलों पर गीत गाती सखियों से।हवा जब सामने खड़ी नीली पहाड़ियों पर कविताएँ रचती और डूबता सूरज जब उसकी आँखों के आगे अपनी रंगोलियाँ बिखेरता, तो ऐसे में वह भी एक नग्मा हवाओं के साथ किसी अनजान प्रेमी और पति के नाम उन पहाड़ियों पर जड़ देती। फिर वह मुस्कराती प्यार के खयाल से प्यार कर बैठती। सुहागरात का स्वप्न देखती और पलंग पर औंधी पड़ जाती ।माँ चेताती, “औरत की जड़ रसोई में होती है। कुछ खाना पकाना-सीख।” पिता आश्वस्त करते, “दूध-भरे थाल-सा यह रूप, जहाँ जाएगी उजाला फैल जाएगा।”वह दोनों की ही सुनती, गुनती, पर राह अपनी ही चलती। और फिर एक दिन वह खुशियों के बादलों पर सवार होकर अपने शहजादे के पास । अपनी ससुराल ।इस रूप की रानी को देख शहजादे के अहं का वितान और तना सीना गज-भर और फैला। पत्नी को प्रेम की भरपूर सौगात दी उसने । वह खिल उठी।उसका प्रेम मीराबाई और मधुमती के बीच की चीज जैसा ही कुछ था। इस कारण जब-जब आधुनिकता और टी० वी ० विज्ञापनों का दबाव उस पर बढ़ता जाता वह पूरे दमखम के साथ अपने शरीर के रखरखाव में लग जाती। एक कुशल मालिन की तरह वह अपनी देह की बगिया को इस कदर सँवारकर रखती कि मजाल किसी कोने-अंतरे में धूल का कोई कण तक दिख जाए। बाहर की कड़कती धूप से जब देह की बगिया कुम्हलाने लगती तो वह कभी खीरे का रस तो कभी पके पपीते के छिलके को रगड़-रगड़कर चमड़ी की नमी बनाए रखती। उस पर भी संतोष नहीं होता तो कभी कम पाउडर तो कभी चार्ली परफ्यूम का स्प्रे दे मारती ।उसकी सहेली ने उसे समझाया था कि देह और साँसों की गंध का भी परवान चढ़ते प्रेम में अहम हिस्सा होता है। जब-जब उसे सहेली की सीख याद आती, वह दिन में चार बार नहाती और छह बार ब्रश करती। गरज यह कि जीवन की बगिया में प्रेम का जो नया-नया अंकुर फूटा था, उसे वह जी-जान से हर हालत में परवान चढ़ाना चाहती। पति के बाहर से आते ही वह चुस्त कमांडो की तरह उसकी आवभगत में लग जाती। फूलों की डिजाइन वाला बॉम्बे डाइंग का गमछा आधा भिगोकर उसे देती। उसकी इच्छा तो होती कि अपने महकते आँचल से पति के ललाट का पसीना पोंछ डाले, पर उसकी हिम्मत जवाब दे जाती। उस पारंपरिक परिवार पर इतना उत्कट रोमांच भारी पड़ जाता। उसकी सयानी आँखों ने ताड़ लिया था कि पति और परिवार का आसमान उतना विशाल नहीं था कि उसके रोमांस का वितान खुलकर तन सके। यहाँ खर्च की चाहे कोई सीमा-रेखा न हो, पर पति-पत्नी के प्रेम की एक अदृश्य सीमा-रेखा हर दिशा में खिंची रहती थी, जिसके आगे जाना घर की मर्यादा और संस्कृति को ताक पर रखने जैसा होता ।रात जब वह सोने जाती तो उसे फिर अपने कॉलेज के दिनों की वे मनचली और रसभरी रोमांटिक बातें याद आतीं जो उसने अपनी सहेलियों के साथ ‘इलू-इलू’ गाना गाते वक्त सुनी थीं।पर अब रातों की चमक धीरे-धीरे ढलान पर उतरने लगी थी। उसका शृंगार अकसर अनदेखा ही बासी पड़ने लगा था। अब उसमें भी आहिस्ता-आहिस्ता सधानापन भरने लगा था। अकसर वह स्वयं को समझाती- ‘चाँद-सितारों वाला प्यार भी भला कोई प्यार होता है। वह तो क्षण भर के लिए अपनी कौंध दिखाकर हमेशा के लिए बुझ जाता है। असली प्यार तो जीवन की भूल-माटी में पनपता है और जीवन के साथ आगे बढ़ता है।’ इस समझावन-बुझावन के बावजूद कई बार उसका मन वितृष्णा से भर उठता, विशेषकर तब जब पति के बदन से फूटती पसीने की तीखी गंध उसे असह्य होने लगती। वह फिर स्वयं को समझाती-‘यह गंध नहीं, श्रम की महक है।’और आश्चर्य, धीरे-धीरे वह उस दुर्गंध की भी आदी हो गई। उसे उसमें भी महक आने लगी।जिंदगी का प्रवाह धीमी गति से इसी प्रकार चलता रहा। पहाड़ी नदी की तरह प्रेम इसी तरह कभी सतह पर आता, कभी गहरे डूब जाता कि एक दिन यह चलती-फिरती फिरकी अचानक रुक गई। कोमल कोमल-सा वह जो इन दिनों उसके भीतर उग रहा था, काँच के बर्तन की तरह चट्-चटू टूट गया। यूँ हुआ कुछ भी नहीं था, पर कई बार क्षण-भर की छोटी-सी कोई घटना समय के विराट् कालखंड पर अपने नख गड़ा देती है। जमाना और इतिहास यूँ ही नहीं बताते हैं कि हर बड़े बदलाव के बीज किसी अदना-सी घटना में ही छिपे रहते हैं।वह मनहूस सुबह थी, किसी चील की तरह उस घर के आँगन में उतरी और जिंदगी पर अपने पैने पंजे गड़ाकर चली गई और देखते-देखते प्रेम की एक शीतल धारा एक बागी लपट बन गई।आप विश्वास कीजिए, ऐसा कुछ भी नहीं घटा था, पर जैसे कभी-कभी गहन दुःख के अँधेरे में एकाएक कोई सत्य कौंध जाता है वैसे ही उस सुबह एक छोटे-से मजाक ने प्रमिला की आंतरिक सत्ता को हिलाकर रख दिया था। इस कदर कि जिंदगी के सारे अर्थ, संदर्भ और समीकरण ही बदल गए।उस मनहूस सुबह की भोर रिमझिम-रिमझिम बारिश से हुई थी और आप जानते ही हैं कि नए-नवेले प्रेम को पराकाष्ठा तक पहुँचाने में बरसात की कितनी अहम भूमिका होती है। प्रमिला का भी मन-मयूर झूम उठा। पति परदेश होता तो वह लंबी-लंबी आहें भर लेती, पर यहाँ तो पति बस हाथ- भर दूरी पर था। उसने सोचा, क्यों न रसोई के साथ देह जोड़कर पति का दिल जीता जाए क्यों न कुछ ऐसा दिव्य-लजीज बनाया जाए कि घर एक साथ वृंदावन और ताजमहल बन जाए।पति के फीके पड़ते प्रेम को गुलाबी रंगत देने के लिए वह अपने अभियान में जुट गई। पूरी तल्लीनता से वह टमाटर, प्याज, हरी मिर्च और अदरक का कॉकटेल तैयार करने में जुटी थी कि यह क्या ? लगा, जैसे पीठ पर किसी ने गरम-गरम पानी का बैलून दे मारा हो। गर्दन को 175 डिग्री के कोण पर घुमाया तो देखा, झाग-भरे मुँह से पति दाँत निपोर हँस रहे हैं। होंठों से बाहर बहती टूथपेस्ट के झाग की धारा को देख मन फिर विरक्त हुआ, पर साथ ही समझते देर नहीं लगी कि पीठ पर जो सफेद घोल का पानी गिरा, उसका स्रोत क्या था ।उसकी आवाज तन गई, “यह जूठा कुल्ला आपने थूका मेरी पीठ पर?”वीर दर्प से उसने कहा, “कुल्ला तो जूठा ही होगा। मजाक में  थूक दिया, क्या हो गया? इतनी लाल-पीली क्यों हो रही हो ?””मजाक ?”प्रमिला की छाती में जैसे दरार पड़ गई। साँस घुटने लगी, कैसा आदमी!औरत को भैंस बराबर नहीं समझता।तरेरती आँखों ने फिर पूछा, “किसने सिखाई यह बदतमीजी ?””तू मजाक के भी काबिल नहीं, ” और लंबे-लंबे डग भरते वह चला गया। चोरी और सीनाजोरी? शरीर का पोर-पोर गुस्से और अपमान से थरथरा उठा उसका। चेहरा उस फौजी अफसर-सा हो गया, जिसके सारे तमगे और मेडल भरी सभा में उतार लिए गए हों।म्यान से निकली नंगी तलवार की तरह वह लहराई। अपमान से थरथराई और अभी-अभी पकड़ी गई मछली की तरह छटपटाई- ‘इश्श ! किस कूड़ेदान की अर्चना करती रही वह भी। कहाँ कंचन- सी उसकी काया और कहाँ यह जूठा कुल्ला !’सास के भीतर भी वर्षों पूर्व का भुलाया सत्य सिर उठाने लगा। बहू की उन्मादिनी-सी हालत देख वह उसके चोट खाए संसार पर मलहम लगाने लगी, “यह घर का नहीं, गाँव-भर का दस्तूर है बेटी! धीरे-धीरे तू भी इसकी आदी हो जाएगी। यहाँ जिंदगी के चारे और बाकी सभी सुख-सुविधाओं के साथ जूठा कुल्ला भी मिलता है। इसने अपने बाप को भी इसी प्रकार कुल्ला फेंकते देखा था। इसका बाप तो इससे भी आगे था… तब नवाबी के दिन थे। हर शाम इसका बाप रंडियों की बस्ती में चला जाता था। वहाँ इतनी चढ़ा लेता था कि धुत पड़ा रहता। आधी रात को नौकर-गुमाश्ते उसे लादकर घर लाते। मेरी सास उसे उस हालत में घर में नहीं घुसने देतीं, कहतीं, घर अशुद्ध हो जाएगा। मैं ड्योढ़ी से ही गंगाजल पकड़ा देती। उसके शरीर पर छिड़काव किया जाता, फिर वह उसे मेरे कमरे में पटक जाते। शराब की गंध से बजबजाती उसकी गीली देह को मैं पोंछती, नए कपड़े पहनाती हर रात का यह दस्तूर था । “सास अपने प्रवाह में बोले जा रही थी। पर वहाँ प्रमिला थी कहाँ, जो उसकी समझावन-बुझावन पर कान देती। वह तो उसी क्षण धुआँ बन उड़ चली थी। उस एक क्षण ने सदियों का हिसाब बराबर कर दिया था। वह एक क्षण दुनिया के सारे पुरुषों की संवेदनहीनता और क्रूरता का प्रतीक बन उसके भीतर ठहर गया था और उसकी चेतना पर चोंच मारता रहा था। उस एक क्षणके बाद से ही वह मुँह में कुल्ला भरे जंगल-जंगल भटक रही है, क्योंकि समय और इतिहास ने उसे समझा दिया है कि जैसे जिंदगी का जवाब जिंदगी है, वैसे ही कुल्ले का जवाब कुल्ला है।

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