इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार (भाग-1)

इतिहासपुरुष

‘तानाशाही के खतरे वाली जो बात तुम कर रहे थे वह तो सचमुच संभव लगती है। इस आदमी में तानाशाही प्रवृत्ति कूट-कूटकर भरी है। उसका चेहरा नहीं देखते। बोलता है तो लगता है बुलडॉग भौंक रहा है, पंजे मारता हुआ।’
मैंने कुछ खिन्न स्वर में कहा, ‘तुम्हें तुम्हारी पार्टी ने संस्कार में यही दिया? इससे आगे बढ़ने का मंत्र तक नहीं सिखाया।’
उसका चेहरा देखने लायक था।
मैं उस पर सवार हो गया, ‘देखो, तुम किसी व्यक्ति का अपमान नहीं कर रहे हो। अपने देश के प्रधानमंत्री का अपमान कर रहे हो। उस जनता का अपमान कर रहे हो जिसने उसे सिर-माथे चढ़ा लिया। और अपना भी अपमान कर रहे हो, क्योंकि तुम उसे देश के नागरिक हो जिसका प्रधानमंत्री वैसा है, जैसा तुमने बनाना और दिखाना चाहा।’
‘गलती हो गई भाई। माफ भी करो।’
‘गलती नहीं हुई है, यह तुम्हारी आदत का हिस्सा बन गया है, वरना यह बात तुम्हें कल ही समझ में आ गई होती, और इस गलती की नौबत न आती। बुरा मत मानना, साम्यवाद की लोरी सुनाते-सुनाते तुम्हें ऐसा घोल पिलाया जाता रहा कि तुम आदमी से भेड़िये में तबदील हो गए। तुम्हें अविजेय बनाने के लिए असरदार नारेबाजी और हंगामेबाजी की आदम डाली जाती रही। तुम्हारा सबसे प्रबुद्ध वर्ग तो मजदूर वर्ग है। सर्वहारा। उसकी भाषा तुम्हारे सुशिक्षित, प्रतिबद्ध वर्ग की आदर्श भाषा बन गई। वह समादृत संबंधों के स्वजनों-परिजनों के अंग-उपांग का नाम लेकर प्रजनन प्रक्रिया से जुड़े शब्दों का प्रयोग गाली के रूप में अपने कथन को प्रभावशाली बनाने के लिए करता है, तुमने गालियों का स्तर थोड़ा ऊपर कर दिया। तुमको किसी ने बताया नहीं कि यह फासिस्टों और नाजियों की भाषा है और इसी धज में तुम्हें लंबी जबान और छोटे दिमाग के साथ फासिज्म से लड़ने को खड़ा कर दिया गया, जबकि तुम्हें यह बताया तक नहीं गया कि फासिज्म है क्या बला, किन परिस्थितियों में पैदा होता है, वह अपने भीतर से ही कितना खोखला होता है। बताया सिर्फ यह गया कि अन्य गालियों की तरह फासिज्म भी एक गाली है। जिसकी जबान बंद करनी हो उसे फासिस्ट कह दो और डंका बजाओ। अब तुम्हें आत्मोद्धार के लिए, अपने भेड़िये से लंबी जंग लड़नी होगी दुबारा आदमी बनने के लिए।’
वह ‘अब फूटा-तब फूटा’ की स्थिति में था। मैं आवेश में बोल तो गया पर ग्लानि मुझे भी थी। दोष उसका तो न था। एक जमाने में मैं यह भाषा भले न बोलता था, पर मुझे यह बुरी कतई नहीं लगती थी। ‘आधा गाँव’ के कुछ चरित्रों की भाषा आज भी गलत नहीं लगती। प्रश्न औचित्य का है। कुछ देर तक हम चुप बैठे रहे। जब चुप्पी भारी पड़ने लगी तो बात उसे ही शुरू करनी पड़ी, ‘मैंने कुछ सख्त बात कह दी, उसका खेद है, लेकिन यह तो मनोगे ही कि उसमें तानाशाही प्रवृत्ति है?’
‘भले मानस, खेद हुआ और जबाने संभाली तो कम से कम ‘उनमें’ तो कहा होता। चलो माफ किया। एक दिन में हुआ भी तो कितना सुधार होगा।
‘रही बात तानाशाही प्रवृत्ति की तो यह प्रवृत्ति तो मुझमें भी है। तुम मेरे लिखने-पढ़ने के कमरे को देखो तो बस केआस नजर आएगा। चीजें बिखरी हुई हैं। जो अपनी किताबें और कागज संभाल नहीं पाता वह भी सोचता है कि अगर मौका मिले तो मैं दुनिया को इस तरह चलाऊं। तानाशाह होना सभी चाहते हैं। कम से कम वे जो अपने घर परिवार को किसी आदर्श संस्था के रूप में चलाना चाहते हैं, छोटे-मोटे तानाशाह ही बने रहते हैं। तानाशाही इतनी बुरी चीज नहीं है। हां, दुरुस्त भी नहीं है। तानाशाह तो गांधी जी भी बनना चाहते थे और सच कहो तो जब तक उनकी चली तानाशाह ही बने रहे। नेहरू ने तो अपनी तानाशाही आकांक्षाओं के बारे में एक लेख, मॉडर्न रिव्यू में चाणक्य के नाम से लिखा था। बाद में किसी ने पूछा, क्या अब भी आप में वह प्रवृत्ति है, तो कहा, ‘मैंने पहले ही इसे भांप लिया था इसलिए बच गया।’ बचे वह भी नहीं, पर कोशिश करते रहे। नेहरू में जितना अंतर्विरोध मिलेगा उतना दूसरे किसी नेता में नहीं। वह अपने से लड़ते भी थे, अपने को छिपाते भी थे और अपनी जिद पर आ जाने पर जानते हुए कि यह शायद ठीक नहीं है वही करते थे। वह तानाशाही प्रवृत्ति उनमें दबी रही, इन्दिरा जी में उभर आई, पर इस प्रवृत्ति से लड़ने की कोशिश वह भी करती थीं, केवल कभी-कभी। संजय में यह जबरदस्त थी। मूर्खता की हद तक। मेनका में भी उतनी ही प्रबल है। जो लोग निर्माण करना चाहते हैं, वे जो कुछ जिस तरह बनाना चाहते हैं, उसमें बाधा न पड़े, सभी एक लय में, तालमेल से काम करें, उस सपने को साकार करने को जो महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति को तानाशाह बनाता है। फिल्म का डायरेक्टर, टीम का कप्तान, ऑर्केस्ट्रा का संचालक, सेना का नायक सभी तानाशाह ही होते हैं। तानाशाही प्रवृत्ति का मूल यही है। और तुमको तो ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए। तुम लोग तो स्वयं तानाशाही के पक्षधर हो। !

“अरे भई, वह तानाशाही किसी व्यक्ति की नहीं होती।’

मैं हँसने लगा तो वह सकपका गया।

“पहले इस कटु सत्य को समझो कि मोदी एक विषेष ऐतिहासिक परिस्थिति की उपज है। इतिहासपुरुष है। उसे भारतीय जन समाज ने 2013 में तानाशाह के रूप में… !

*2013 में नहीं, 2014 में और तानाशाह के रूप में नहीं, भावी प्रधानमंत्री के रूप में। तानाशाह वह खुद बनना चाहता है। जब तुम इतनी मामूली बातें भी नहीं समझ पाते तो… ‘

मैंने उसे वाक्य पूरा करने ही नहीं दिया, ‘2014 में निर्वाचन हुआ और जनता पार्टी जीती। जनता ने तो 2013 में ही उपलब्ध तानाशाहों में से किसी एक को चुनना आरंभ कर दिया था-आडवानी को इतने नंबर, राहुल को इतने, सोनिया को इतने, नीतीश को इतने और मोदी को इ-त-ने। एक बार नहीं, बार-बार मोदी को इ-त-ने नंबर मिलते रहे। जब किसी एक व्यक्ति को केंद्र में रखकर पूरा चुनाव हो तो जीत या हार किसी दल की नहीं होती, तानाशाह की होती है।’

‘ जनता का विश्वास कांग्रेस के कारनामों के कारण लोकतंत्र से उठ गया था। वह तानाशाह चुन रही थी और मोदी को चुन लिया था। कर्मकांड 2014 में पूरा हुआ। कांग्रेस 2013 में मान चुकी थी कि वह हार गई और जल्दी-जल्दी जो जर-जमीन हथियाया जा सकता था उसे हथियाने पर जुट गई थी, फिर भी एक आखिरी बाजी उसने लगाई, सबको भोजन का अधिकार। समाज ने समझा, ‘सब कुछ खा जाने का अधिकार।’ उसने कांग्रेस को यह बता दिया कि देश-हित तुम्हारी प्राथमिकता नहीं। उसने उसे हराया नहीं, धक्के देकर बाहर कर दिया, यह देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है, परंतु इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

‘ अकेली ऐसी पार्टी जिसका देशव्यापी जनाधार था, जो ही विकल्प बन सकती थी, उसने अपना नैतिक औचित्य खो दिया। वह हारी नहीं। लोकतंत्र में हार-जीत होती रहती है। कांग्रेस का सफाया हो गया फिर भी प्रबल शक्ति बन कर सत्ता में आई, क्योंकि जिस विकल्प ने उसे सत्ता से बाहर किया था, वह धँस गया। कोई दूसरा विकल्प ही न था। इस बार कांग्रेस हारी नहीं है, अपनी भ्रष्टता के कारण अपना नैतिक अधिकार खोकर धँस गई है और अब नेहरू परिवार से बाहर आकर भी अपने मलबे सँभाल नहीं सकती। दुखद स्थिति है, पर है। क्या किया जा सकता है!

‘ इसमें आशा की किरण एक ही है कि लोगों ने भले तानाशाह चुना हो, इस व्यक्ति को लोकतंत्र में इतना अंडिग विश्वास है कि यह अपना विकल्प स्वयं पैदा करेगा। पर वह विकल्प या विपक्ष विकास की नीतियों से संचालित होगा, जाति और धर्म से नहीं।

‘ और जानते हो यह भी मोदी के कारण नहीं होगा, इतिहास के कारण होगा। पूँजीवादी विकास के कारण होगा। तानाशाही पूँजीवाद को रास नहीं आती। तानाशाही मध्यकालीन मनोवृत्ति है। तानाशाह स्वेच्छाचारी राजा का प्रतिरूप। मोदी को इसकी समझ हे, दूसरों को नहीं। वह बार-बार इसकी याद दिलाते हैं कि यह लोकतंत्र की महिमा है कि एक चाय बेचने वाला देश का प्रधानमंत्री बन गया। यह भारत में उभरते पूँजीवादी दबाव की भी महिमा है या नहीं?

‘ जनता ने भले तानाशाह चुना हो वह तानाशाह लोकतांत्रिक बने रहने के लिए संघर्ष कर रहा है, दुश्मनों और सगों दोनों से एक साथ लड़ता हुआ। ‘

02-11-2015

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