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Vartmaan ki Dhool

250.00 212.50

ISBN: 978-93-83233-79-3
Edition:  2015
Pages: 128
Language: Hindi
Format: Hardback


Author : Gobind Prasad

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Category:

Description

‘वर्तमान की धूल’ गोबिन्द प्रसाद का तीसरा काव्य संग्रह है जो एक छोटे से अंतराल के बाद आ रहा है। इस संग्रह के पाठक सहज ही लक्ष्य करेंगे कि इस कवि का अपना एक अलग रंग है जो सबसे पहले उसकी भाषा की बनावट में दिखाई पड़ता है और बेशक अनुभवों के संसार में भी। मेरा ध्यान सबसे पहले जिस बात ने आकृष्ट किया वह यह है कि इस कवि ने हिंदी और उर्दू काव्य भाषा की बहुत सी दूरियाँ ध्वस्त कर दी हैं। और इस तरह एक नई काव्य-भाषा बनती हुई दिखती है। इसे गोबिन्द प्रसाद की एक काव्यगत सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। यह वह परंपरा है जिसकी शुरुआत कभी शमशेर ने की थी और गोबिन्द प्रसाद इसे आज की ज़रूरत के मुताबिक एक नए अंदाज़़ में आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं । पर केवल इतनी सी बात से इस संग्रह की विशेषता प्रकट नहीं होती। असल में यहाँ गोबिन्द प्रसाद एक गहरी घुलावट वाली रूमानियत के समानांतर एक विलक्षण राजनीतिक चेतना को भी बेबाक ढंग से व्यक्त कर सके हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘अल्लाह नहीं अमेरिका जानता है’ शीर्षक कविता जिसकी आरंभिक दो पंक्तियाँ हमारे समय की एक बहुत बड़ी राजनीतिक गुत्थी को खोलती जान पड़ती हैं–
किस देश में कल क्या होगा
अल्लाह नहीं अमेरिका जानता है।
यह पूरी कविता इतने बेबाक ढंग से लिखी गई है कि अलग से हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। यह गोबिन्द प्रसाद के कवि से हमारा नया परिचय है जो इन्हें उनकी पिछली कृतियों से अलग करता है। एक और छोटी सी राजनीतिक कविता पर मेरा ध्यान गया जिसका शीर्षक है ‘क्रांति की जेबों में’। यह एक गहरी चोट करने वाली व्यंग्य की कविता है जो शाब्दिक क्रांति के आडंबर पर चोट करती है। इस दृष्टि से इस कविता का अध्ययन दिलचस्प हो सकता है।
इस संग्रह की कई छोटी कविताएँ आधुनिक प्रेम की विसंगतियों को खोलती दिखाई पड़ती हैं। कुल मिलाकर यह संग्रह अनुभव के विभिन्न आयामों से गुज़रता हुआ–जिसमें कुछ विदेशी पृष्ठभूमि के अनुभव भी शामिल हैं–एक भरी-पूरी दुनिया का फलक हमारे सामने रखता है। मैं आज की हिंदी कविता के एक पाठक के रूप में यह पूरे बलाघात के साथ कह सकता हूँ कि संग्रहों की भीड़ में गोबिन्द प्रसाद का यह नया काव्य प्रस्थान अलग से लक्षित किया जाएगा।
–केदारनाथ सिंह

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