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Vah Chhathavan Tattva

125.00 106.25

ISBN: 978-81-88466-23-8
Edition: 2004
Pages: 106
Language: Hindi
Format: Hardback


Author : Om Bharti

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Category:

Description

वह छठवाँ तत्त्व
जिसे मेरी कविताएँ पसंद नहीं
उसकी भी कोई कविता
पसंद है ज़रूर मुझे—
ओम भारती के नए संग्रह की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ विनम्रता नहीं, उसकी रचनात्मक सचाई की सूचक हैं। इन कविताओं से गुज़रने के बाद मुझे लगा कि यह एक ऐसे वयस्क कवि का संग्रह है, जिसमें चीज़ों को निकट से जानने, चुनने और अपनी संवेदना का हिस्सा बनाने की एक उत्कट इच्छा है और अपने आज़माए हुए नुस्ख़ों और औज़ारों को फिर से जाँचने-परखने की एक सच्ची ललक भी। यही बात संग्रह की कविताओं को पठनीय बनाती है। इस कवि के अनुसार– कविता वह होती है, जिसमें भेद छुपे हेते हैं, जो भेद खोल देते हैं। इसका सबसे विश्वसनीय उदाहरण है इस संग्रह की वह कविता, जिसका शीर्षक है ‘इस संशय के समय में’। विक्रम सेठ के ‘सुटेबुल ब्वाय’ की तरह यह बहन के लिए एक अच्छे वर की तलाश की कविता है—
अच्छे लड़के नहीं हैं कहीं भी
हों भी तो शायद खुद उन्होंने
असंभव कर रखा है ढूँढ़ लिया जाना अपना।
और फिर कविता के उत्तरार्द्ध में निष्कर्षतः यह कि—
इस संशय के समय में
क्या अच्छाई खो चुकी तमाम आकर्षण?
इस कविता का अंत दिलचस्प है और थोड़ा विडंबनापूर्ण भी, क्योंकि कवि को लगता है—‘अच्छे लड़के नहीं हैं अथवा हैं तो वे इस कवि से कहेंगे—बेवकूफ़, हमसे तो मिला होता लिखने से पहले।’ यह एक गंभीर विषय को हलके-फुलके ढंग से कहने का अंदाज़ है, जो कविता को एक नया तेवर देता है।
इस संग्रह की अनेक कविताओं में एक चुभता हुआ व्यंग्य है और कवि के पास उसे व्यक्त करने का चुहलभरा कौशल भी। इस दृष्टि से कई और कविताओं के साथ-साथ ‘निरापद’ कविता ख़ास तौर से पठनीय है, जो इस प्रगतिकामी कवि की लगभग एक आत्मव्यंग्य जैसी कविता है। कवि की यह खेल जैसी शैली एक तरह से इस पूरे संग्रह के चरित्र-लक्षण को निर्धारित करती है। ‘इस तरह भोपाल’ कविता इसका एक प्रतिनिधि नमूना है, जिसकी शुरू की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
जहाँ भोपाल—
वहाँ अब संख्या और किलोमीटर नहीं हैं
मगर वहाँ भी एक तीर की नोक से,
आगे है भोपाल
उस जगह न कोई खंभा,
न कोई तख़्ती और न ही संकेत
कि यह है, क़सम हुज़ूर, यही तो है—
भोपाल!
मध्यप्रदेश की कहन-शैली के रंग में ढली हुई ये कतिवाएँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करेंगी और बेशक काव्य-मर्मज्ञों का भी।
—केदारनाथ सिंह

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