Sale!

नये सिरे से / Naye Sire Se

195.00 165.75

ISBN : 978-93-81467-28-2
Edition: 2012
Pages: 136
Language: Hindi
Format: Hardback


Author : Govind Mishr

Compare
Category:

Description

गोविन्द मिश्र की पहली कहानी ‘नये पुराने मां-बाप’ ‘माध्यम’ (इलाहाबाद: संपादक बालकृष्ण राव), 1965 में प्रकाशित हुई थी। लिख वे इसके पहले से रहे थे। इस तरह कहानियों लिखते हुए गोविन्द मिश्र को लगभग पचास वर्ष होने को आ रहे हैं। प्रस्तुत संग्रह में उनकी 2010 तक की नई कहानियां हैं, जो पिछले किसी संग्रह में नहीं आई हैं। यहां वे जैसे कहानी को नये सिर से पकड़ने चले हैं। पहले जो लेखक कभी कोई जीवन-स्थिति, व्यक्ति की भीतरी जटिलता, समाज के नासूर, जीवन के खूबसूरत रंग जैसी चीजों से कहानी पकड़ता दिखा था, वह यहां बिलकुल फर्क ढंग से चला है। पिछले इतने सारे वर्षों में अर्जित परिपक्वता में, जैसे-कला, शिल्प, भाषायी सौष्ठय जैसी चीजें ही घुलकर खो गई हैं। कहा भी जाता है कि सर्वोच्च कला वह है जहां कला ही तिरोहित हो जाती है। रह जाती है तो सिर्फ स्वाभाविकता, जिसके रास्ते जीवन कला में सरक जाता है; कलाकृति जीवन की आकृति नहीं, साक्षात् जीवन दीखती है।
करीब-करीब इन सभी कहानियों में दर्द की एक खिड़की है, जिसके पार जीवन है, अपनी गति से पल-पल सरकता हुआ। …उस खिड़की से उदासीन जिसके रास्ते जीवन दिखाई देता है। जीवन जो है, वह बदलता नहीं…लेकिन दर्द से उठतीं कुलबुलाहटें हैं उसे बदलने की। और तेज आवाज है स्त्रियों की, जिनमें कुछ नया कर गुजरने, कोई रास्ता ढूंढ़नपे और दिखाने की बेचैनी है-चाहे वह ‘तुम हो’ कि सुषमा हो या ‘छाया’, ‘मोहलत’ और ‘प्रेमसंतान’ की ‘वह’। गोविन्द मिश्र जो अकसर अपने पात्रों को ‘यह’ या ‘वह’ कहकर अनाम छोड़ देते हैं…तो शायद इस आशय से कि भले ही दर्द की वह दास्तान खास हो, पर वह है आम ही….और यह तार फिर उसी स्वाभाविकता से जुड़ता है, जहां कलाहीनता ही सर्वोच्च कला है।

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “नये सिरे से / Naye Sire Se”

Your email address will not be published. Required fields are marked *