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Khabar

1,150.00 977.50

ISBN: 978-93-81467-31-2
Edition: 2012
Pages: 776
Language: Hindi
Format: Hardback


Author : Pranav Kumar Vandyopadhyay

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Category:

Description

खबर

अपने कथ्य को कम शब्दों में रखना वंद्योपाध्याय की विशेषता है। वह अकारण शब्दों को विस्तृत नहीं होने देते। जब वह जगदंबा द्वारा पत्नी पर मार-काट सामने लाते हैं, जबान को बहुत फैलने नहीं देते। कथा में परेशान विनायक सामने आता है। उपन्यास में जब कथा आगे चलती है, अलग किस्म के अनेक पात्रा सामने आ जाते हैं। उपन्यास में असंख्य पात्रा हैं। इन्हीं से उपन्यास अपना आकार पाता है। कथा के असंख्य चरित्रा आते और जाते हैं, और वे फिर आ जाते हैं। विनायक के बाद मुख्य चरित्रा है नैना। दूसरे तमाम बिहारीपुर के लोगों के माफिक वह एक औरत है, जो सबसे अलग है। अंत में विनायक का एकदम चले जाना एक विराट् घटना है। हम महसूस करते हैं बिहारीपुर की हंसी अब हलकी हो गई। बस, बिहारीपुर फिर भी इसी तरह चलता रहता है।
-द टाइम्स आफ इंडिया
शायद बिहारीपुर में बहुत कुछ नहीं घटता…लेकिन अंततः जो सब घटते हैं और जो सब किस्से, कहानी उभरते हैं, शहर किसी न किसी बहाने सामने आने लगता है। -द हिंदू
बिहारीपुर मोहल्ले में (खबर) वैसे तो खास चीजें नहीं घटतीं, लेकिन कई ऐसी छोटी-छोटी घटनाएं उभरती हैं जो सामने आती हैं और महत्त्वपूर्ण हैं। एक ऐसा ही उपन्यास है। देखने में
आता है उत्तर प्रदेश के बरेली में कई चीजें अपने तरीके से घटित होती हैं। घटनाओं के अपनी रगों में जब भी नए अनुभव सामने आते हैं, उनका महत्त्व कम नहीं है। ऐसे बहुत सारे कांड सामने आते हैं, जिनमें गर्भवती औरतें, नपुंसक पुरुष, मोहल्ले के झगड़े, छोटे ढाबे में बैठकर चाय की चुस्की, चबाते हुए पान आदि अनेक बातें सामने आती हैं। एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें एक- एक पात्रा की कई कहानियां हैं। उपन्यास में लुक्का पहलवान और उसकी पत्नी परमेसरी के बीच झगड़े अंतहीन हैं। लोगों को इससे काफी मजा आता है। अड़ोस-पड़ोस के लोगों को काफी कुछ दिखाई भी पड़ता है। लोगों को एक छोटी बात भी दिनों तक याद रहती है। घटनाओं के कई सारे अंश अपने हिसाब से टूटते और जुड़ते भी रहते हैं। इसका फैसला शायद एक न एक दिन हो भी जाता है। यह एक सामाजिक सत्य है, जिसकी सच्चाई आज के समय पर आधारित है। इसमें एक व्यक्ति जो पत्राकार है इस पर जो कुछ लिखता है वो उपन्यास को अपने तरीके से गढ़ता है। यह एक सच्चाई है। -डैकन हैरल्ड
उपन्यास की घटनाएं रोचक ढंग से सामने आती हैं। ‘मालगुडी डेज़’ की तरह उपन्यास आगे और पीछे जाता रहता है। उपन्यास के तमाम पात्रा अपने-अपने तरीके से सामने तो आते हैं, लेकिन कई बातें एकदम अलग हैं। उपन्यास के प्रत्येक अंश में कई बातें एकदम नहीं होतीं, जिससे कथा एकदम बदल जाती है। दूरदर्शन के धारावाहिक ‘नुक्कड़’ में भी इसी तरह बनती और टूटती है। -इंडियन एक्सपे्रस
खबर की तमाम बातें स्थानीय भाषा और लहजे पर सामने आती हैं। कथा में कुछ लोग तो मेहनतकश हैं, कुछ भंगी हैं, कुछ हैं स्थानीय गंुडे और शराबी। गरीबी की मार लोगों पर इतनी ज्यादा है कि वे चटपटी बातों के अलावा कुछ और देख या सुन नहीं पाते। उपन्यास के पात्रा परशुराम वैद्य और मुरारी डाॅक्टर अपने हिसाब से काम कर रहे हैं। विनायक के कर्म को छोटा करने के लिए वे जब तब मिलते और सोचते रहते हैं। उपन्यास का मुख्य पात्रा विनायक जो एक श्रम संगठन का नेता है और होम्योपैथी का डाॅक्टर। कोई ध्यान नहीं देता। विनायक का भद्र आचरण उसे बहुत दूर शायद ले नहीं जाता। वो बिहारीपुर के कौशल्या भवन के बीच अपने परिचय के साथ बहुत कुछ देखता रहता है। लेखक एक शहर के तमाम गरीबों पर अलग-अलग अनुभव प्राप्त करता रहता है। अपने अनुभव से वो देखता है एक नया संसार। -संडे
इस उपन्यास के भीतर असंख्य चरित्रा, तमाम घटनाएं और बिहारीपुर के ढेर सारे लोग और उनकी कथाएं हैं। इसके भीतर तमाम लोग किसी न किसी बहाने कथा में आते रहते हैं। कथा के बीच विद्यानिवास तिवारी जो एक प्राथमिक स्कूल का शिक्षक है और संभवतः एक ज्योतिषी भी। पात्रा की बेटी जानकी एक शराबी के प्रेम में डूब जाती है। वह एक पहलवान भी है। नाम है लुक्का। जिस पर कोई न कोई जुड़ा हुआ है। उसमें कोई गांजे का दम भरता है । साथ हैं भोलानाथ गिरी। आगे है नौरंगीलाल अपने ढंग से चलने वाला ‘एडवोकेट साहिब’, जो एक जिले की कचहरी में एक छोटा-मोटा क्लर्क-भर है, जिसकी तमाम बातें घड़ी के पेंडुलम की तरह हिलती रहती हैं। इसका एक केंद्रीय चरित्रा विनायक तमाम पात्रों और घटनाओं को देखता रहता है। और उसके बाद आती है नैना, मेम के चरित्रा में जो उपन्यास को अपने ढंग से गढ़ती और तोड़ती रहती है। यह उपन्यास अलग-अलग घटनाओं को जिस प्रकार संजोता है वो एक अभूतपूर्व अनुभव है। -इंडियन रिव्यू आफ बुक्स

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