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Aapki Pratiksha

270.00 229.50

ISBN: 978-81-89982-66-9
Edition: 2012
Pages: 180
Language: Hindi
Format: Hardback


Author : Shyam Vimal

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Category:

Description

आपकी प्रतीक्षा
सच भी कई बार कल्पना को ओढ़कर नई भंगिमा अपनाकर कागज की पीठ पर सवार होने को आतुर हो उठता है। अथवा यूं भी कहा जा सकता है कि कल्पना कभी-कभी सच-सी भ्रमित करने लगती है और रिश्ते बदनाम होने लगते हैं।
जैसे होता है न, मरे हुए कीट-पतिंगे को, गिरे हुए मिठाई के टुकड़े को समग्रतः घेरे हुए लाल चींटियां आक्रांत वस्तु की पहचान को भ्रमित कर देती हैं। यदि ऐसा भ्रम मृत कीट या मिठाई-सा इस रचना से बने तो समझ लो आपने रचना का मज़ा लूट लिया।
उपन्यासकार को आश्वासन दिया गया था पत्रा का सिलसिला जारी रहने का इस वाक्य के साथ–
‘यह वह धारा है जो क्षीण हो सकती है, पर टूटेगी नहीं।
परंतु वह सारस्वत धारा तो लुप्त हो गई!
क्या प्रतीक्षा में रहते रहा जाए?
अंजना की दूसरी जिंदगी कैसे निभ रही होगी?’

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