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कठिन समय में / Kathin Samay Mein

300.00 255.00

ISBN: 978-81-937925-4-4
Edition: 2018
Pages: 152
Language: Hindi
Format: Hardback


Author : Ramesh Chandra Shah

Category:
हिंदी की वरिष्ठतम पीढ़ी के अनूठे रचनाकार रमेशचन्द्र शाह की डायरी पढ़ना एक विशेष अनुभव से गुजरना है। डायरी लेखन की इनकी प्रथम कृति ‘अकेला मेला’ के पाठक जानते हैं कि इसमें 1981 से 1985 तक की अवधि के अनुभवों का संसार शामिल था। इस विधा की शाह जी की दूसरी कृति ‘इस खिड़की से’ 1986 से 2004 तक का उनका संसार समाहित किए हुए थी। डायरी की तीसरी कृति का शीर्षक है ‘आज और अभी’। इसका फलक 2004 से 2009 तक फैला हुआ है। अंतःप्रक्रियाओं का यह क्रम चैथी डायरी कृति ‘जंगल जुही’ में 2013 तक का कालखंड आबद्ध करता है। इस कृति में रमेशचन्द्र शाह रामप्पा, ऋषियों की घाटी, यादगिरिगुट्टा और भोंगीर का किला, नागार्जुनकोंडा, हम्पी आदि की यात्राओं वेफ बहाने एक अद्भुत संसार से अंतरंग परिचय कराते हैं। इस तरह कि देखना, सुनना, स्पर्श करना, सूंघना और आस्वाद वेफ साथ आत्मसात् करना एक रचना की विधा ही बन जाए। अकारण नहीं कि इस कोलाजमय डायरी में प्राग का यात्रा-प्रसंग भी आ जुड़ा था। यहाँ एक नाट्य वृत्तांत इसका आधर बना।
पाठकों द्वारा सराही गई और आलोचकों द्वारा बहुप्रशंसित इन डायरी कृतियों का नव्यतम पड़ाव है ‘कठिन समय में’। यहाँ 15 सितंबर, 2009 में जयपुर से प्रारंभ हुई बाह्य व अंतर्यात्रा अंततः 23 फरवरी, 2017 को भोपाल के हिंदी भवन में हुए शरद व्याख्यान तक चली आई है। पाठक यहाँ भी वही रस, प्रवाह, गहराई और अंतरंगता अनुभव करेंगे।
शाह जी की मान्यता इस विधा पर सटीक है—‘डायरी ऐसी विधा है जिस पर परनिर्भरता लागू नहीं होती।’ वह इसे दैनंदिन घटनाओं, चरित्रों और यात्रा-प्रसंगों के लिए सही जगह मानते हैं। यहाँ आत्मसंवाद भी है और संवाद भी, किंतु एक बहुपठित, निश्छल साहित्यिक, रसिक और खोजी व्यक्ति उसमें इस तरह संलग्न रहता है कि पढ़ने वाले की समझ का आकाश और विस्तृत हो जाता है। कारण यह कि रमेशचन्द्र शाह, वस्तुतः व्यक्ति को नहीं, उसे उसकी पूरी परंपरा में देखना पसंद करते हैं। यही कारण है कि उन्हें सीमन्तनी को देख रांगेय राघव और उनकी स्फूर्ति याद हो आती है। ‘आइडेंटिफिकेशन आॅफ वुमेन’ जैसी फिल्म देखकर वह इस महाप्रश्न से जूझते हैं कि नायक को आखिर चाहिए क्या था?
उनका संवाद समय के अपने सरीखे शिखर व्यक्तियों से चलता रहता है। वह किताबों पर टिप्पणियाँ करते हैं, तो ऐसे कि पाठक उन्हें पढ़ने की कुंजी ही पा जाएँ। जैसे श्री अरविंद वेफ ‘लाइफ डिवाइन’ और प्लेटो के ‘दि रिपब्लिक’ पर एक साथ विचार करते हुए वह अतिमानस के अवतरण की चर्चा करते हैं। सच बात तो यह है कि रमेशचन्द्र शाह की इस पाँचवीं डायरी कृति में विश्व वेफ आधुनातन व पुरातन सभी कला-क्षेत्र सहजता से आ जाते हैं। पढ़ते-पढ़ते आप समझ जाएँगे कि यह रचनाकार अपने शेष समय को ‘ही हैज रिटन द बुक आॅफ हिज लाइफ’ सरीखे रचनात्मक काम में ‘आत्मा’ नाम की असलियत का पता लगाते हुए व्यतीत करना चाहते हैं। कहना आवश्यक है कि शाह जी की यह डायरी कृति हिंदी साहित्य को अपनी तरह से समृद्ध करती है।