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कम्बख्त निंडर / Kambakht Nindar

978.00 831.30

Author : Narendra Mohan
ISBN : 978-93-83233-17-5

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आत्म की धुरी पर घूमती नरेन्द्र मोहन की आत्मकथा का पहला खंड ‘कमबख़्त निंदर’ एक ऐसी कृति है जो उनकी निजी जिंदगी के सुख-दुःख और तल्खियों के साथ-साथ परिवेश, समाज और राजनीति के तीखे प्रश्नों के साथ गहरी आत्मालोचना में बिंधी हुई है। दो आपातकालों के बीच लिखी गई यह जीवन-कथा कई स्तरों पर पाठकों को अपनी-सी लगेगी। पहला आपातकाल लेखक की जन्म-घड़ी है – स्तब्ध कर देने वाला उसका नितांत निजी अनुभव जो उसे ताउम्र जकड़े रहा और दूसरा विकट और भयावह वह आपातकाल (1975-77) जिसकी दहशतनाक सलवटों में पूरा देश सन्न रह गया। बचपन से, जवानी से, दूसरे आपातकाल तक के निजी, पारिवारिक संतापों और तनावों को ही नहीं, सामाजिक, राजनीतिक संघर्षों के समूचे यथार्थ को यह काल-खंड समेटे हुए है। यहां निंदर के होने मात्र से सामान्य से ब्यौरों में धार और द्वंद्वात्मकता आ गई है। नरेन्द्र मोहन के साथ निंदर यहां एक केंद्रीय मेटॉफर का दर्जा प्राप्त करता गया है जो जितना दिलकश है उतना अर्थपूर्ण भी ।

नरेन्द्र मोहन ने सयानेपन और चौकन्नेपन से परे रहते हुए अपने हाथों अपना चित्रण यहां बेहद ईमानदारी से किया है जिसे पाठक इस किताब के रेशे- रेशे में महसूस कर सकते हैं।

घटनाओं और हादसों की अहमियत हर आत्मकथा में रहती है। मगर ‘कमबख़्त निंदर’ में इनका अपना ही रंग है। आगे-पीछे के प्रसंगों के संयोजन में यहां गहरी जिज्ञासा, आकर्षण और नाटकीयता है। इनकी चुभन और खलिश, आह्लाद और आनंद के नुकीले-चमकीले बिंबों ने जब लेखकीय मन को घेरा है तो समां बंध गया है, घटनाएं और हादसे और के और हो गए हैं। यह इस आत्मकथा की ऐसी विशेषता है जो इसे भारतीय भाषाओं में लिखी गई आत्मकथाओं में अलग खड़ा कर देती है।

सभी के लिए निश्चय ही पढ़ने लायक एक बेहतरीन आत्मकथा ।