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जकड़न / Jakadan

125.00 106.25

ISBN : 978-81-7016-697-9
Edition: 2011
Pages: 96
Language: Hindi
Format: Hardback


Author : Mahasweta Devi

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Category:

Description

पुलिस अफसर ने काफी सहनशील ढंग से और सहानुभूति-भरी नजर से एक बार देखा। विनय के साहित्य में पुलिस कितनी क्रूर, कुटिल, निर्मम है, लेकिन अभी उनकी पुलिंग से कितना सद्भावपूर्ण व्यवहार मिल रहा है। हालांकि बउआ की मां ने कहा था-तुम लोगों के घर की बात है, इसीलिए इतना कुछ हो पा रहा है बहू जी! हम लोगों के लिए होता? कितना कुछ घटा, लेकिन मुए थाने ने सुना कभी? अफसर कहता है, मुझे लगता है इसलिए कह रहा हूँ, मैं सरकारी तौर पर नहीं कह रहा हूं, ऐसा लगता है कि उनमें किसी बात पर झगड़ा हो रहा होगा, अचानक गुस्से में आकर एक पीतल की ऐशट्रे फेंककर मारी, वह जाकर नस पर लगी, उससे आपकी बेटी बेहाशे होकर गिर पड़ी, उसके बाद…
-इसी उपन्यास से

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