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Ek Na Ek Din

600.00 510.00

ISBN : 978-81-89859-68-8
Edition: 2013
Pages: 340
Language: Hindi
Format: Hardback


Author : Rajni Gupta

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Category:

Description

एक न एक दिन

पिछले कुछ वर्षों में स्त्राी-पुरुष संबंधों के असमंजन और असमंजसग्रस्त अवसाद का स्वरूप कुछ बदला हैµविशेषकर शहरी मध्यवर्ग के उन परिवारों में, जहाँ स्त्रिायाँ शिक्षित हैं, परिवार के बाहर भी एक बंधु-परिवार ;थ्ंउपसल व िथ्तपमदकेद्ध जिनका है ! वहाँ एक कलाकार, अफसर, शिक्षक के रूप में इनकी मान्यता है, सम्मान भी ! नई कहानी के ज़माने की बीमार (‘परिंदे’), बेचारी (‘एक कमज़ोर लड़की की कहानी’, ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’), बिंदास (‘मचाचा’) और आसानी से बरगलाई जा सकने वाली टाइपिस्ट/पीॉएॉ (‘आधे-अधूरे’) बालाओं के ज़माने लदे ! अब जो कथा-नायिकाएँ हैंµकृति या अनन्या की पीढ़ी कीµउनका अपना एक अलग प्रभामंडल हैµएक प्रेमी का स्थानापन्न वहाँ कई प्रशंसक हो गए हैं। पर कभी-कभी वे चाहे-अनचाहे एक नई तरह की समस्या खड़ी कर जाते हैंµघर में, और बाहर भी ! खब्तुलहवास पति के अहं पर चोट कर उसे और अधिक खूँखार बना देते हैं, कई तरह की ठोस और फोकी असुरक्षाएँ गढ़ते हैं उसके भीतर, तरह-तरह के प्रवाद फैलाते हैं; कई दफा अनुचित प्रस्तावों की मूक शृंखला से स्लो-पेस में बलात्कार की ऊभ-चूभ पैदा करते हैं और मुसीबत की घड़ी ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। चूँकि वे ‘दोस्त’ (?) होते हैं या सहकर्मी यानी कि आस्तीन का साँपµउन्हें उस तरह झटका जाना संभव नहीं होता जैसे प्रकट दुश्मन को झटक सकते हैं।…कुल मिलाकर स्थिति ‘तार से गिरे, खजूर में अटके’ वाली बनती है…बेटे कुछ दिनों तक माँ से सहानुभूति रखते हैं, फिर उनकी अपनी एक दुनिया हो जाती है। हाँ, बेटियों का सखी-भाव अक्सर अंत तक बना रहता
है ! मित्रा, बहन या बेटी के रूप में स्त्राी का अवलंब स्त्राी ही बनती है या उसको खुद ही अपनी सहेली बन जीना होता है।
तो घर-बाहरµदोनों जगह स्त्राी के दुःख के टाँके महीन हुए हैं ! कई बार खुली आँख से दीखते भी नहीं, तभी लोग उन्हें ‘खाती-पीती, सुख से ऊबी और बेकार बेचैन महिलाओं का शगल’ कहते हैं! रजनी एक स्त्राी-लेंस लेकर सामने आती हंै और भूमंडली- करण (नहीं, भूमंडीकरण) के बाद की पीढ़ी के चैहान साहब और राजीव जैसे फर्राटेदार, नो-नाॅन्सेंस, राॅबटनुमा पुरुषों को भी आईना दिखाती हुई उनसे पूछना चाहती हैं कि रैट रेस जीतकर भी चूहा चूहा ही रह जाता है, आदमी तो नहीं हो जाता! कंप्यूटर की दुनिया हो या कला-जगत्µस्त्रिायों को अपने पाए का और किंचित् विशिष्ट ‘मनुष्य’ समझे बिना पुरुष भी आधे मशीन और आधे पशु ही बने रहेंगे ! दोहरे मानदंड पूँछ की तरह कभी तो झड़ेंगे ही !
जहाँ तक बच्चों का सवाल है, ‘आपका बंटी’ भी बड़ा हो गया है ! तनावग्रस्त परिवारों में या अकेली माँओं के संरक्षण में पलते बच्चों का मानसिक धरातल, उनकी परिपक्वता और (कभी-कभी) कटुता भी प्रश्नविकल बंटियों से तो काफी अधिक होने लगी है।
पारिवारिक जीवन के इन सब ‘बड़े’ किंतु ‘सूक्ष्म’ परिवर्तनों का सजग साक्ष्य वहन करती रजनी की सरल-सहज भाषा रिश्तों के बीच पसरी ‘कच्चे-
पके आमों की खट्टी बास’ कई मांसल बिंबों और सूक्ष्म विवरणों में पकड़ती है। उपन्यास में ‘घोरबाइरे’ की बिमोला और ‘द डाॅल्स हाउस’ की नोरा के आत्मसंघर्ष का एक नया चरण आपके सामने खुलता चला जाता है…!!
-अनामिका

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