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Vivekanand Ki Atmakatha

600.00 510.00

ISBN : 9789350480502
Edition: 2020
Pages: 376
Language: Hindi
Format: Hardback
Author : Sankar

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Category:

Description

स्वामी विवेकानंद नवजागरण के पुरोधा थे। उनका चमत्कृत कर देनेवाला व्यक्‍तित्व, उनकी वाक‍्‍शैली और उनके ज्ञान ने भारतीय अध्यात्म एवं मानव-दर्शन को नए आयाम दिए।
मोक्ष की आकांक्षा से गृह-त्याग करनेवाले विवेकानंद ने व्यक्‍तिगत इच्छाओं को तिलांजलि देकर दीन-दुःखी और दरिद्र-नारायण की सेवा का व्रत ले लिया। उन्होंने पाखंड और आडंबरों का खंडन कर धर्म की सर्वमान्य व्याख्या प्रस्तुत की। इतना ही नहीं, दीन-हीन और गुलाम भारत को विश्‍वगुरु के सिंहासन पर विराजमान किया।
ऐसे प्रखर तेजस्वी, आध्यात्मिक शिखर पुरुष की जीवन-गाथा उनकी अपनी जुबानी प्रस्तुत की है प्रसिद्ध बँगला लेखक श्री शंकर ने। अद‍्भुत प्रवाह और संयोजन के कारण यह आत्मकथा पठनीय तो है ही, प्रेरक और अनुकरणीय भी है।

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अनुक्रमणिका

प्राकथन — 7

1. मेरा बचपन — 19

2. श्रीरामकृष्ण से परिचय — 26

3. श्रीरामकृष्ण ही मेरे प्रभु — 56

4. आदि मठ बरानगर और मेरा परिव्राजक जीवन — 77

5. पारिवारिक मामले की विडंबना — 85

6. कुछ चिट्ठियाँ, कुछ बातचीत — 88

7. परिव्राजक का भारत-दर्शन — 99

8. विदेश यात्रा की तैयारी — 111

9. दैव आह्वान और विश्व धर्म सभा — 113

10. अमेरिका की राह में — 116

11. अब अमेरिका की ओर — 119

12. शिकागो, 2 अतूबर, 1893 — 127

13. धर्म महासभा में — 133

14. घटनाओं की घनघटा — 138

15. संग्राम संवाद — 141

16. भारत वापसी — 242

17. इस देश में मैं या करना चाहता हूँ — 277

18. पश्चिम में दूसरी बार — 296

19. फ्रांस — 319

20. मैं विश्वास करता हूँ — 327

21. विदा वेला की वाणी — 334

22. सखा के प्रति — 353

परिशिष्ट — 355

मंतव्यावली — 357

तथ्य सूत्र — 358

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