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Ikkisveen Sadi : Kavita Aur Samaj

690.00 586.50

ISBN: 978-93-83234-49-3
Edition: 2016
Pages: 416
Language: Hindi
Format: Hardback


Author : Jagdish Narayan Shrivastava

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Category:

Description

‘आज जैसा कष्ट है, उसमें सबसे बड़ी चुनौती तो कवि की ही है। हर युग के कवि को कोई न कोई चुनौती मिलती रही है, चाहे समाज की परंपरा दे, चाहे दर्शन दे, चाहे राजनीति दे लेकिन सबको मिलाकर इतनी बड़ी चुनौती कभी नहीं मिली, जो आज मिली है। हर देश के कवि को मिली है, हमारे देश के कवि को ही नहीं मिली है। ‘अस्ति-नस्ति’ के बीच में अगर हम रोक सकें ध्वंस को तो जीवन बच जाएगा। न रोक सकेंगे तो जीवन जाता रहेगा।…
यहां नई पीढ़ी के कवि हैं, पुरानी के भी हैं।…दो पीढ़ियां न सामने हों तो चलता नहीं है।…कवियों की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी जब मित्र की तरह सामने होती हैं तब शायद बड़ा साहित्य बनता है और अगर दोनों लड़ते हैं तो उनकी लड़ाई ही समाप्त हो जाती है।
जो आज का कवि है वह आज की परिस्थिति को देखे लेकिन युगबोध के साथ वह युगांतरबोध को भी जाने। कविता लिखना एक सामाजिक कर्म तो है ही। समान गति रखता हो वह समाज है, कवि उसी से आता है और उसकी व्यथा जानता है। सुख-दुःख जानता है। चेतना के अनेक स्तर हैं, उनमें एक सहचेतना है। अपने युग को समझने के लिए और बहुत से कर्म के संस्कार इनमें हैं, जो अब चेतना है। अपने युग को समझने के लिए एक पराचेतना भी है। ये सब चेतनाएं एक साथ कविताओं में मिल जाती हैं, तब हमें एक बड़ा कवि मिलता है। इसलिए युगबोध तो है ही आपका, युगांतरबोध भी होगा आपके पास।…जब ये सब मिलते हैं तो एक महान् कवि आता है।
चिंतन सिर्फ बुद्धि की प्रक्रिया है पर अनुभूति सिर्फ बुद्धि की प्रक्रिया नहीं है। बड़ा कवि होने के लिए विशाल अनुभूति होती है, भाषा-संवेदना होती है, आंसू भी होंगे, हंसी भी होगी।
‘कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू’–इससे बड़ी परिभाषा नहीं है कवि की क्योंकि वह मनीषी है, सब कालों को मिलाकर देखता है, वह परिभू है, सबमें, सबके हृदय को जानता है और स्वयंभू होता है।…
भाषा-भाव-अनुभूति विलक्षण हो तो आप पूरी समष्टि को बना सकेंगे। पर उसके पहले आपकी कविता पहले आपको बनाएगी। जो कविता आपको नहीं बना सकती, वह किसी को नहीं बनाएगी।’
—महादेवी

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