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Antargatha / अन्तर्गाथा

675.00 573.75

ISBN: 9788170282839
Edition: 2016
Pages: 506
Language: Hindi
Format: Hardback

Author : P.V. Narasimha Rao

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Description

‘‘रात जैसे-जैसे ढलने लगी और चुनाव का आखिरी सवेरा नज़दीक आता गया, एक बिलकुल ही नया दर्शन जन्म लेने लगा। जब सूरज चमकता है तो आप मुफ्त उसका फायदा उठाते हैं, आपको बदले में सूरज को कुछ देना नहीं पड़ता। धन की यही स्थिति है, यह सबकी संपत्ति है-यह जब आता है (जो बहुत कम ही होता है) तो आप उसे लेते हैं। शराब की भी स्थिति यही है-यह देवताओं का सोमरस है, और जिस प्रकार सभी भक्तों को देवता समान रूप से प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार यह पेय सभी को प्राप्त होता है। सेक्स की भी यही स्थिति है-स्त्री सामने हो तो सब-कुछ जायज़ हो जाता है। नए नारों की जय! ज़मीन किसकी-जो बोता है! धन किसका-जो उसे ले ले! शराब किसकी-पीने वाले की! औरत किसकी-भोगने वाले की!…और इस तरह रात जब बिलकुल खत्म होकर सुबह का उजाला निकलने लगा, माया का यह नया दर्शन भी फैलने लगा था। कोई भी मतदाता किसी से बंधा महसूस नहीं कर रहा था। नशे में धुत सब सोच रहे थे कि आखि़रकार हमारा एक स्वतन्त्र देश है और यहाँ का हर स्त्री-पुरुष स्वतन्त्र है।’’ (अध्याय-34) ‘‘विनोद, तर्क और विश्लेषण से भरपूर। सेक्स-चेतना के विकास के स्पष्ट विवरण…। तीन प्रधानमंत्रियों-जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गाँधी-के नेतृत्व-गुणों, कमज़ोरियों और सिद्धान्तों का विस्तृत अध्ययन। राजनीति में भ्रष्टाचार, अनैतिकता और मक्कारी आदि के विकास के नाटकीय रोचक चित्रण।’’-दि वीक

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